Monday, July 13, 2009

अंहकार ही मनुष्य के े पतन का कारण-श्री राजरत्नविजयजी

अंहकार ही मनुष्य के े पतन का कारण-श्री राजरत्नविजयजी
.>> आशीष पोरवाल
रतलाम। मुनिराज राजरत्नविजयजी म.सा. ने धर्मसभा में कहा कि अंहकार मनुष्य को पतन के े गर्त में ले जाता है। जलन, द्वेष, अहम, राग-रस, अंहकार के आभूषण है।
आपने कहा कि अंहकारी का अच्छा बनने में खुश नहीं,अच्छा दिखने में खुश्। स्वार्थसिद्धी के लिए परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन होता है। अहंकार वहां अहम नदारद है। अहंकार क कारण नाक का सवाल उठाकर संपूर्ण (अरिहंत) जगत में संघर्ष व्याप्त है। धर्मसभा में मैत्रीकुंभ (नवकार कलश) को श्रद्धालुओं ने अभिमंत्रित वासक्षेप से भर दिया। पश्चात १२ नवकार का जाप किया गया। यह कलश नवकार के जाप के े लिए धर्मालुजन घर-घर ले जाएंगे, वहां सामूहिक जाप द्वारा लाखों-करोड़ों नवकार का जाप होगा। संघ के े पारस भण्डारी ने बताया कि मैत्री कुंभ के लाभार्थी समीरमल ललवानी परिवार एवं मैत्रीकुंभ घर के े लिए चांदमल ज्ञानचंदजी सुराणा परिवार है।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अंहकार ही मनुष्य के पतन का कारण!
मुनिराज राजरत्नविजयजी म.सा. ने धर्मसभा में कहा कि अंहकार मनुष्य को पतन के गर्त में ले जाता है। जलन, द्वेष, अहम, राग-रस, अंहकार के आभूषण है।

मुनिराज राजरत्नविजय जी ने बिल्कुल सही कहा है।