Wednesday, September 1, 2010

क्या मतलब ऐसे चिरकट पौधा रोपण का ?

 क्या मतलब ऐसे चिरकट पौधा रोपण का ?
-पंकज व्यास, रतलाम
एक दिन एक पौधा आकर मुझसे बोला-भई लिख्खाड़ मेरे तो करम ही फूटे हैं। मैंने पूछा- क्यों, क्या हो गया? वो बोला- जिसे देखो वो मुझे रोंपने चला है। मैंने कहा- तेरक तो खुश होना चाहिए, लोग तुझे रोंप रहे हैं, तू ही आगे जाकर वृक्ष बनेगा और पर्यावरण पोषण में सहायक बनेगा।  वो बोला- खाक वृक्ष बनेगा। मैं पौधा एक, ...और रोंपने वाले 10-10। सब मिलकर मुझक रोपते हैं, फोटो खिंचवाने के  लिए। दस-दस हाथ मेरी मुंडी पकड़ते हैं।  पौधा रोपण क पहले ही अनजाने में कचुमर बनाने में कई कसर नहीं छोड़ते हैं। बाद में ध्यान नही देते। अब भला मैं कसे विकस करूंगा और बताओ कसे वृक्ष बनुंगा।

Wednesday, February 17, 2010

व्यंग्य / जय रतलाम कि हाय रतलाम....

पंकज व्यास,रतलाम
आजकल मैं बड़ी खुशफहमी में जी रहा है। बड़ा खुश हूं, अचानक मुझे लगने लगा है कि रतलाम का विकास होने लगा है। रतलाम विकास कर रहा है। ऐसा लगता है जैसे रतलाम विकास के चौक्के-छक्के जड़ कर मानेगा। मैं बड़े सुनहरे स्वप्न में डूबा हुआ हूं। रह-रह कर मुझे रतलाम की जय-जयकार सुनाई दे रही है। जय रतलाम की गुंज कानों में गुंज रही है। शहर में लगे रतलाम की  जय-जयकार करते होर्डिंग मेंरा सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं। मुझे अपने रतलाम पर बड़ा अभिमान हो रहा है। शहर में हर दूसरा-तीसरा व्यक्ति  रतलाम की जय-जयकार करता दिखता है, तो मैं रतलाम के सुनहरे भविष्य में डूब जाता हूं...