Tuesday, September 29, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1


  • बात संगीता पुरी जी की .
संगीता पुरी जी उन लोगों ी प्रतीक है, जो ऐसा मानते हैं कि वक्त के साथ भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म में कई बुराई आई हंै, लेकिन उन बुराईयों के बावजुद हिन्दू धर्म में अथाह ज्ञान का सागर है, उनका लक्ष्य है अच्छाई को देखना। ये उन लोगों में शुमार है, जो भारतीय विधाओं में बुराईयों को दरकिनार कर भारतीय विधाओं का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो चाहते हैं कि हिन्दू धर्म में छुपे हीरे-मोती को जनमानस के सामने लाया जाए।
संगीता पुरी जी उन लोगों में शामिल की जा सकती हंै, जो भारत की प्राचीन विधाओं पर गर्व करते हंै और भरपुर विश्वास भी करते हैं। फ़िर भी नवीनता लिए हुयें है....

Sunday, September 27, 2009

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं।
बड़े आगे हर क्षेत्र में, चूमे आसमां
आपकी हर शुभ हो विजय
विजयादशमी पर है ये कामनाएं....

पंकज व्यास, रतलाम

Thursday, September 24, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

  • बात प्रवीन जाखड जी की.....
पंकज व्यास रतलाम
22 सितंबर को ब्लॉगवाणी को देखा कि अनायास एक हेडिंग पर नजर गई। हेडिंग थी संगीतापुरी जी को दंडवत् प्रणाम! पहले तो लगा जैसे नवरात्रि चल रही है, तो ये ब्लॉगर बंधु संगीतापुरी जी में देवी का अंश देख प्रणाम कर रहे हैं। लेकिन, हेडिंग पर चटका लगाया, टिप्पणियों पर नजर गई तो समझ में आ गया कि माजरा कुछ ओर है। सही कौन है, गलत कौन है? इस बात की चर्चा करना मेरा मकसद नहीं है और न कभी रहेगा। मेरा उद्देश्य यही नहीं रहेगा कि सही कौन है, मेरा लक्ष्य है सही क्या है?

Wednesday, September 23, 2009

संगीता पुरी जी के बहाने सबसे एक निवेदन....

सगीता पुरी जी के बहाने सभी से सादर निवेदन,

संगीता पुरी जी आपने मेरी टिपण्णी के जवाब में आपके ब्लॉग में टिपण्णी की

सी एम प्रसाद जी ,
कहीं आप मुझको ही तो प्रणाम नहीं कर रहें :)

आदरणीया,

संगीता पुरी जी सादर निवेदन,
मै न तो आपके बारे मै जानता हूँ, न प्रवीण जाखड़ जी के बारे में। आप दोनों का नाम तो प्रतीकात्मक रूप से उपयोग किया जायेगा। आप दोनों तो माद्यम बनने वाले है।


जिस विषय पर मैं लेख माला प्रवीण जाखड़ जी और चलाने वाला हूँ, मुझे लगता है आप और प्रवीण जाखड़ जी दोनों उस कार्य में मेरी ख़ुद मदद करेंगे, जो में करना चाहता हूँ।

इस लेख की हेडिंग में आपका नाम है, लेकिन मेरा मकसद आप दोनों की आलोचना करना नही होगा, इस बात पर आप यकीं कर सकतें है।

जिस विषय पर में लिखना चाह रहा था, उद्द्वेलित था, आंदोलित था, उस विषय को लिखने का माध्यम आप दोनों बनेगे, मेने कभी सोचा न था, मेने सोचा न था इतना जल्द में इस विषय के बार में लिखने का मन बना पाऊँगा।

मेरा सोभाग्य है की आप दोनों के बहाने से में अपनी बात अच्छी तरह से रखा पाउँगा, आप दोनों को इस बात के लियें धन्यवाद, में आप दोनों का आभारी रहूँगा...

आप से इतना निवेदन है, की आप मेरे बारे में कोई मत बनाने से पहले लेखमाला को पुरी पढें। जिस तरह में आप दोनों से किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नही हूँ। ठीक उसी प्रकार आप भी मेरे बारें में बिना किसी पूर्वाग्रह के लेखमाला पड़ेंगे तो आपका अहसान रहेंगा...

जहांतक आपक कहना -सी एम प्रसाद जी , कहीं आप मुझको ही तो प्रणाम नहीं कर रहें :) तो इतना ही कहूँगा की प्रथम तो मेरे पास इतना समय नही रहता है, की में सीएम गिरी करुँमुझे तो कमेंट्स कराने का और ब्लॉग पड़ने का टाइम भी निकालना पड़ता हैमें हर ब्लॉग पर टिपण्णी नही कर पता हूँ, लेकिन कई बार कमेंट्स कराने से मेरा दिल मानता नही, तो दिमाग की नही दिल की बात सून टिपण्णी करता हूँइस बात से आप ख़ुद अंदाज लगा सकते है कि मई सीएम गिरी में, बन्दर बाट में अपना समय कैसे दूँगा ?

आपसे निवेदन है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के मेरी लेख माला पढें, और आपको और जाखड जी को मेरा उद्देश्य उचित लगें तो सहयोग दे

आप कोई जवाब देना चाहतें है, तो उसकी कॉपी करे कमेन्ट मेरे ब्लॉग पर भी कर दिया करें, या लिंक बना दियां करेंएक बार किसी ब्लॉग पर कमेन्ट कराने के बाद मेरे लियें फ़िर से उस ब्लॉग पर उसी दिन उसी पोस्ट के लियें जन जिस पोस्ट पर टीप्पणी कि थी इत्तफाकन ही होता है... ये निवेदन जरूर स्वीकारे

आपके बहाने सबसे यही निवेदन हें
बिना किसी पूर्वाग्रह के मुझे पढें
धन्यवाद

अनाम शहीदों का श्राद्घकर्म किया

जब श्रधा कर्म चल रहा था तब किसी ब्लॉग पर मैंने इस आशय की पोस्ट पड़ी थी की क्या शहीदों का श्रद्धा कर्म किया जाता है ? बदनावर से पत्रकार जमील कुरैशी के सोजन्य से पेशा है ये समाचारज्ञात- अज्ञात शहीदों का श्रद्धा कर्म 5 (पाच) सालो से किया जा है। भविष्य में एक रपट भी पेश करूंगा।
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पंकज व्यास रतलाम

मध्य प्रदेश के धार जिले के बदनावर में यहां नागेश्वर मंदिर परिसर में स्थित शहीद गैलरी में भारत के अमर क्रांतिकारियों एवं अनाम शहीदों को याद करते हुए सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर उनकी आत्म शांति हेतु तर्पण एवं कर्मकांड कर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

प्रवीण जाखड़ जी और संगीता पुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है....

जल्द एक पोस्ट पुब्लिश करूंगा

प्रवीण जाखड़ जी और

Monday, September 21, 2009

नवरात्र व् ईद कि शुभ - कामनाएं.....

ईद की कोटि कोटि शुभ कामनाएं....
न हो मन में बेर-भावनाएं....
रहें हम पाक- पावन,
ऐसी हो हम सबकी भावनाएं...

खुदा का नूर हो, नवरात्र का सुरूर हो
न कोई दिल से दूर हो,
ऐसी करें हम माँ की आराधना
कि ही हर ओर माँ की महिमा का गान हो...


नवरात्र व् ईद कि शुभ - कामनाएं.....

Sunday, September 20, 2009

मोबाइल में ईनाम का मैसेज, कहीं पछताना न पड़ जाए

mobile मोबाइल में ईनाम का मैसेज, कहीं पछताना न पड़ जाएआप उन खबरों को भूले तो नहीं होंगे, जिनमें ई-मेल के माध्यम से ठगने की घटनाएं प्रकाश में आई थीं। लेकिन, आने वाले दिनों में ठगी के ऐसे प्रकरण सामने आए, जिनका कारण मोबाइल का इन-बॉक्स रहा हो, जो कोई आश्चर्य नहीं। कारण, जिस तरह के मेल ई-मेल पर मिलते रहे हैं, उसी तरह के संदेश अब मोबाइल पर आने शुरू हो गए हैं।

Saturday, September 12, 2009

पांच फीट की लौकियां


बदनावर जिला धर में आदिवासी कृषक मांगूजी गामड़ के कालेज के सामने स्थित कृषि भूमि में पांच फीट की लौकियां (आल) उपजी हैं। कृषक मांगू गामड़ ने हाईब्रिड बीज बाहर से बुलवाकर बोए थे। अब इन बेलों में पांच फीट लम्बाई की कई लौकियां बढ़ रही हंै। इन्हें बेचने की बजाए बीज के लिए सहेज कर रखा गया है।

Thursday, September 10, 2009

व्यंग्य: क्या करें, ये मास्टर मानते ही नहीं...

पंकज व्यास, रतलाम
क्या करें साब! ये लोग तो ऐसे नाक-भौं सिंकोड़ रहे हैं, जैसे बहुत बड़़ी बात हो गई हो। शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों पर लाठी चार्ज क्या कर दिया, मानो पहाड़ टूट गया, आसमान फट गया, जिसको देखों वो सरकार की आलोचना करने में लगा है। कोई ताने कस रहा है, तो कोई व्यंग्य कर रहा है।

Wednesday, September 9, 2009

धन्यवाद, आभार ब्लॉगवाणी

ब्लोग्वानी की टीम का बहूत बहूत धन्यवाद, जो उसने मेरे ब्लॉग को ब्लोग्वानी पर शामिल किया। पुनः धन्यवाद...
पंकज व्यास, रतलाम

Monday, September 7, 2009

अब नहीं सुनाई देते संझा के गीत

-पंकज व्यास
श्राद्ध पक्ष चल रहा है, साथ ही संझा पर्व का वक्त भी। सांझ के वक्त मदमस्त चलती बयारों के बीच अगर आपका मन मयुर हो उठे और मन करे चित्ताकर्षक हाथ से बनाई संझा के दर्शन की, इच्छा हो संझा गीतों को सुनने की, तो आपको मशक्कत करनी पड़ सकती है, क्योंकि आपकी ये चाहत सहज में पूरी नहीं हो सकती।

अब ‘संझा’ के लिए बच्चियों, लड़कियों, युवतियों के पास वक्त नहीं है। उन्हें अब पढ़ाई की टेंशन है, उनका ध्यान अब कॅरियर की ओर है और फिर संझा बनाना, मनाना और संझा के गीत गाना अब पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है। यही कारण है कि शहर की पॉस कॉलोनियों में नहीं, निम्नमध्यमर्गीय कॉलोनियों में वह भी बहुतायात में नहीं कहीं-कहीं रस्म अदायगी के लिए संझा बनाई हुई नहीं, चिपकाई हुई मिलेगी। कहीं आपको गीत सुनाई दे तो आपका नसीब और आपको गोबर द्वारा हाथ से बनाई संझा के दर्शन हो जाएं तो आप भाग्यशाली, सौभाग्यशाली! स्पष्ट है संझा पर्व विलुप्ति के कगार पर खड़ा है।

एक वक्त था जब श्राध्द पक्ष में सांझ ढलने को होती और बालिकाएं, लड़कियां, युवतियां संझा की आरती की तैयारी करने लगतीं, घर की दिवार पर चौकुनाकार में गोबर से लीप कर संझा बनाना शुरू करतीं, उस पर फूल पंखुडियां आदि लगातीं, सजातीं और मोहल्ले भर की सहेलियों को बुलाकर संझा के गीत गातीं, आरती उतारतीं, प्रसाद बांटतीं और फिर दूसरी सहेली के घर जाकर वहां भी इस क्रम को दोहराती। दूसरे दिन फिर से दिवाल के उस स्थान को लीपा जाता, जहां संझा बनाई जाती थी और फिर नई संझा बनातीं और फिर वहीं क्रम चलता… रोज नई संझा बनती…

वक्त बदला, वक्त के साथ-साथ लोगों का नजरिया बदला और गोबर से बनने वाली संझा का स्थान बाजार में मिलने वाले प्रिंटेड संझा के पाने ने ले लिया। संझा के पाने ने रोज-रोज गोबर में हाथ करने की मशक्कत को बचा लिया या यूं कही सृजनात्मकता को गृहण लगायाञ रोज रोज संझा बनाने की अब जरूरत नहीं पड़तीं थी, क्योंकि एक ही पाना रोज काम में आ जाता है। फिर भी लड़कियों, युवतियों, बालिकाओं में संझा के प्रति उत्साह बरकरा रहता। चाहे संझा के पाने ने गोबर द्वारा हाथ से बनाई जाने वाली संझा का स्थान ले लिया हो, लेकिन सांझ ढलते ही संझा के गीत मस्त बयारों के बीच सुनाई देने लग जाते।

स्पष्ट रूप से संझा के दो रूप सामने आए, एक ही मोहल्ले में कहीं हाथ से बनाई गई गोबर की संझा की आरती होती, तो कहीं प्रिंटेड पोस्टररूपी संझा की आरती, लेकिन गीतों दौर बदस्तूर जारी रहता।

फिर बदला वक्त, वक्त के साथ लोगों की सोच बदली। अब अभिभावकों के साथ बच्चों का ध्यान केन्द्रित हुआ केरियर की ओर। बच्चों पर बढ़ा पढ़ाई का दबाव। जाहिर सी बात है, संझा पर्व पर भी पढ़ा इसका प्रभाव। अब लड़कियों, युवतियों, बच्चियों को पढ़ाई की चिंता सताती है। उनके पास वक्त इतना वक्त नहीं है कि संझा के गीता गा लें, इतना टाईम नहीं है कि संझा और कॅरियर दोनों पर भी ध्यान दे लें और संझा के गीत भी याद कर लें।

आज के समय में गोबर से बनी संझा के दर्शन शायद ही किसी के हो, पूरी तरह से बनाई जाने वाली संझा का स्थान रेडिमेड संझा के पाने ने ले लिया है। बीच के दौर में जैसे कहीं गोबर की हाथ से बनाई हुई, तो कहीं रेडीमेड संझा देखने को मिल जाती थी, ठीक ऐसे ही कहीं आज संझा के पोस्टर मिलेंगे, तो कहीं संझा मनाई और बनाई ही नहीं जा रही है।

अगर कहीं पर संझा बनाई जा रही है, और गीत गाने का समय है, तो जल्दी-जल्दी में गीत गा लिए, नहीं तो फटाफट आरती कर ली और फिर अपने काम पर लग गए।

बहुतायात में अब संझा के गीत गली मोहल्लों में नहीं गुंजते हैं, अब बस रस्म अदायगी के लिए संझा की पूजा-आरती होती है, वह भी कम ही जगह पर। हालांकि, गांवों में आज भी कहीं संझा के गीत सुनाई, तो देते हैं, लेकिन वहां भी वो उत्साह, उमंग देखने को नहीं मिलता, जो कभी मिलता था।

आज के समय में स्पष्ट रूप से गोबर की बनाई हुई संझा का स्थान बाजार में मिलने वाले रेडिमेड प्रिंटेड संझा के पाने ने ले लिया है। शायद ही कोई को जिसके पास गोबर द्वारा हाथ से बनाई गई संझा का छाया चित्र भी हो। होगा कहां से संझा का स्वरूप बदल गया है।

अभी वो दौर चल रहा है, जिसमें हाथ से बनाई गई संझा विलुप्त सी हो गई है, अब चित्ताकर्षक संझा देखने को नहीं मिलती। संझा के गीत शाम के समय बहुतायात में सुनाई नहीं देते, कुछ जगहों पर ही संझा गीत की रस्म अदायगी की जाती है। पढ़ाई और केरियर का टेंशन जो रहता है।

अगर यही दौर बदस्तुर जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब संझा पर्व इतिहास की बात हो जाएगा। जैसे हाथ से बनाई हुई चित्ताकर्षक संझा के दर्शन दुर्लभ हो गए है, जैसे संझा गीत बहुतायात में सुनाई नहीं देते, ठीक वैसे ही वह दौर भी आ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं हो, जब कहीं-कहीं संझा के पाने तो दिखें, लेकिन गीत गाने का थोड़ा भी समय न हो। भविष्य में आरती-पूजन की रस्म अदायगी भी हो जाए, तो बड़ी बात होगी।

पॉश कॉलोनियों से संझा हुई नदारद

अब रस्म अदायगी के लिए संझा बनाई (माफ कीजिए चिपकाई) जाती है, तो निम्न व मध्यमवर्गीय कही जाने वाली कॉलोनियों में। पॉश कॉलोनियों से संझा नदारद हो गई है। साफ है, संझा के गीत गाना, बनाना, मनाना पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है। सभ्रांत कहे जाने वाली परिवारों की लड़कियों के पास न तो वक्त है, न संझा बनाने, मनाने और गीत गाने की ईच्छा।

संझा गीत

संजा जीम ले, चुठ ले, थने जिमऊं मैं सारी रात, चट्टक चांदी सी रात, फूला भरी रे परात, एक फूलो टूट ग्या, संजा माता रूठ गी…

काजल टीकी लो भई, काजल टिकी लो,, काजल तिटकी लइने म्हारी संजा बाई ने दो, संजा बाई को सासरों, सांगा में, पद्म पदानी बड़ी अजमेर…

मैं कोट चड़ा चढ़ देखूं म्हारो कौन सो वीरो आयो, चांद-सूरज वीरो आयो, घोड़ा पे बैठी ने आयो…

संजा वो की, सोली वो…. आदि गीत शाम के वक्त सुनाई देने शुरू हो गए हैं।

-पंकज व्यास