Monday, November 9, 2009

तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका

 (नोट- यह आर्टिकल प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है मुझे तो कुछ गुजरना है..., का ही भाग है, किन्हीं कारणों से हेडिंग को बदला है। इस आर्टिकल में जानबुझकर प्रवीण जाखड़ जी व संगीतापुरीजी के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन इसे आप प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है... लेखमाला के तारतम्य में ही देखें। बाकी बातों की चर्चा लेखमाला की अगले व अंतिम भाग में करेंगे। फिलहाल तो आप इस आर्टिकल को पढ़ें। लेख बड़ा जरूर है, लेकिन   निवेदन यही कि पढ़कर अपना मत जरूर बताएं। धन्यवाद    -पंकज व्यास, रतलाम)
 तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका
आज ज्योतिष और ज्योतिषियों के हाल किसी से छूपे नहीं हैं, ज्योतिष की सही एवं सटिक भविष्यवाणी यदा-कदा ही देखने को मिलती है।  कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास  मानते हैं, इसका कारण तथाकथित ज्योतिषों द्वारा ठगा जाना रहा है और इसी कारण वे सवाल उठाते हैं। ज्योतिषी उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाते हैं। स्पष्टï है ज्योतिष के जानकारों की कमी है और तथाकथित लोगों को ठगने वाले ज्योतिषयों की भरमार। ज्योतिष की यह दशा क्यों हुई? ज्योतिष की सही व सटिक भविष्यवाणियां अब क्योंं नहीं हो पाती?  ऐसे ही सवालों को जानने का जतन करेेंगे हम।

Monday, October 26, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

एक तरफ संगीतापुरी जैसे लोग हैं, जो भारतीय विधाओं जैसे ज्योतिष आदि के मूल तत्व को जानना चाहते हैं, समर्पित हो जाना चाहते हैं और तमाम आडंबरों व दकियानुसीता  को दूर फटकारते हुए ज्योतिष जैसी विधा को जन जन तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, तो दूसरी तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग हैं, जो ज्योतिष आदि भारतीय विधाओं पर गर्व करते हैं और यकिन भी करते हैं, लेकिन ज्योतिष के नाम पर चल रही दुकानदारी से उन्हें घीन है, जो ज्योतिष के नाम पर हो रही अंधश्रृद्घा और आडम्बर से नफ़रत करते है और इसीलिए जहां कहीं कुछ कमी हो जाती है, ये अपनी कलम के माध्यम से वार करने को बेताब नजर आते हैं, इन्हें तथ्य चाहिए होते हैं और जब इन्हें नहीं मिलते हैं तो ऐसे लोग खुला चेलेंज देते हैं और करते हंै सवालों की बौछार, जब इनको जवाब नहीं मिलता है, तो मुमकिन है कि ज्योतिष से इनकी आस्था धीरे-धीरे कम भी होती जाती है।

Thursday, October 15, 2009

आओ बधाई दो.....

सबको बताई दे है, आज हमरा जनम दिन है,आओ हमको बधाई दो.....
साथ में कोई गिफ्ट -शिफ्ट दो, तो मजा आ जाये,
अगर आप हमको बधाई दो, तो मन प्रफुल्लित होई जाये,
तो दो ना बधाई,  खिलाओ न मिठाई .....
पंकज व्यास, रतलाम

Saturday, October 3, 2009

ब्लॉगवाणी को कुछ सुझाव

ब्लॉगवाणी को कुछ सुझाव
ब्लॉगवाणी को सुझाव सब दे रहे हैं। मैं मेरे मन-मानस में भी कुछ सुझाव आए हैं।  मैं यह नहीं जानता हूं कि व्यवहारिक रूप से इन पर अमल किया जाना संभव है या नहीं, लेकिन इस अकिंचन के कुछ सुझाव हैं जरूर, उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूं।

Tuesday, September 29, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1


  • बात संगीता पुरी जी की .
संगीता पुरी जी उन लोगों ी प्रतीक है, जो ऐसा मानते हैं कि वक्त के साथ भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म में कई बुराई आई हंै, लेकिन उन बुराईयों के बावजुद हिन्दू धर्म में अथाह ज्ञान का सागर है, उनका लक्ष्य है अच्छाई को देखना। ये उन लोगों में शुमार है, जो भारतीय विधाओं में बुराईयों को दरकिनार कर भारतीय विधाओं का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो चाहते हैं कि हिन्दू धर्म में छुपे हीरे-मोती को जनमानस के सामने लाया जाए।
संगीता पुरी जी उन लोगों में शामिल की जा सकती हंै, जो भारत की प्राचीन विधाओं पर गर्व करते हंै और भरपुर विश्वास भी करते हैं। फ़िर भी नवीनता लिए हुयें है....

Sunday, September 27, 2009

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं।
बड़े आगे हर क्षेत्र में, चूमे आसमां
आपकी हर शुभ हो विजय
विजयादशमी पर है ये कामनाएं....

पंकज व्यास, रतलाम

Thursday, September 24, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

  • बात प्रवीन जाखड जी की.....
पंकज व्यास रतलाम
22 सितंबर को ब्लॉगवाणी को देखा कि अनायास एक हेडिंग पर नजर गई। हेडिंग थी संगीतापुरी जी को दंडवत् प्रणाम! पहले तो लगा जैसे नवरात्रि चल रही है, तो ये ब्लॉगर बंधु संगीतापुरी जी में देवी का अंश देख प्रणाम कर रहे हैं। लेकिन, हेडिंग पर चटका लगाया, टिप्पणियों पर नजर गई तो समझ में आ गया कि माजरा कुछ ओर है। सही कौन है, गलत कौन है? इस बात की चर्चा करना मेरा मकसद नहीं है और न कभी रहेगा। मेरा उद्देश्य यही नहीं रहेगा कि सही कौन है, मेरा लक्ष्य है सही क्या है?

Wednesday, September 23, 2009

संगीता पुरी जी के बहाने सबसे एक निवेदन....

सगीता पुरी जी के बहाने सभी से सादर निवेदन,

संगीता पुरी जी आपने मेरी टिपण्णी के जवाब में आपके ब्लॉग में टिपण्णी की

सी एम प्रसाद जी ,
कहीं आप मुझको ही तो प्रणाम नहीं कर रहें :)

आदरणीया,

संगीता पुरी जी सादर निवेदन,
मै न तो आपके बारे मै जानता हूँ, न प्रवीण जाखड़ जी के बारे में। आप दोनों का नाम तो प्रतीकात्मक रूप से उपयोग किया जायेगा। आप दोनों तो माद्यम बनने वाले है।


जिस विषय पर मैं लेख माला प्रवीण जाखड़ जी और चलाने वाला हूँ, मुझे लगता है आप और प्रवीण जाखड़ जी दोनों उस कार्य में मेरी ख़ुद मदद करेंगे, जो में करना चाहता हूँ।

इस लेख की हेडिंग में आपका नाम है, लेकिन मेरा मकसद आप दोनों की आलोचना करना नही होगा, इस बात पर आप यकीं कर सकतें है।

जिस विषय पर में लिखना चाह रहा था, उद्द्वेलित था, आंदोलित था, उस विषय को लिखने का माध्यम आप दोनों बनेगे, मेने कभी सोचा न था, मेने सोचा न था इतना जल्द में इस विषय के बार में लिखने का मन बना पाऊँगा।

मेरा सोभाग्य है की आप दोनों के बहाने से में अपनी बात अच्छी तरह से रखा पाउँगा, आप दोनों को इस बात के लियें धन्यवाद, में आप दोनों का आभारी रहूँगा...

आप से इतना निवेदन है, की आप मेरे बारे में कोई मत बनाने से पहले लेखमाला को पुरी पढें। जिस तरह में आप दोनों से किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नही हूँ। ठीक उसी प्रकार आप भी मेरे बारें में बिना किसी पूर्वाग्रह के लेखमाला पड़ेंगे तो आपका अहसान रहेंगा...

जहांतक आपक कहना -सी एम प्रसाद जी , कहीं आप मुझको ही तो प्रणाम नहीं कर रहें :) तो इतना ही कहूँगा की प्रथम तो मेरे पास इतना समय नही रहता है, की में सीएम गिरी करुँमुझे तो कमेंट्स कराने का और ब्लॉग पड़ने का टाइम भी निकालना पड़ता हैमें हर ब्लॉग पर टिपण्णी नही कर पता हूँ, लेकिन कई बार कमेंट्स कराने से मेरा दिल मानता नही, तो दिमाग की नही दिल की बात सून टिपण्णी करता हूँइस बात से आप ख़ुद अंदाज लगा सकते है कि मई सीएम गिरी में, बन्दर बाट में अपना समय कैसे दूँगा ?

आपसे निवेदन है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के मेरी लेख माला पढें, और आपको और जाखड जी को मेरा उद्देश्य उचित लगें तो सहयोग दे

आप कोई जवाब देना चाहतें है, तो उसकी कॉपी करे कमेन्ट मेरे ब्लॉग पर भी कर दिया करें, या लिंक बना दियां करेंएक बार किसी ब्लॉग पर कमेन्ट कराने के बाद मेरे लियें फ़िर से उस ब्लॉग पर उसी दिन उसी पोस्ट के लियें जन जिस पोस्ट पर टीप्पणी कि थी इत्तफाकन ही होता है... ये निवेदन जरूर स्वीकारे

आपके बहाने सबसे यही निवेदन हें
बिना किसी पूर्वाग्रह के मुझे पढें
धन्यवाद

अनाम शहीदों का श्राद्घकर्म किया

जब श्रधा कर्म चल रहा था तब किसी ब्लॉग पर मैंने इस आशय की पोस्ट पड़ी थी की क्या शहीदों का श्रद्धा कर्म किया जाता है ? बदनावर से पत्रकार जमील कुरैशी के सोजन्य से पेशा है ये समाचारज्ञात- अज्ञात शहीदों का श्रद्धा कर्म 5 (पाच) सालो से किया जा है। भविष्य में एक रपट भी पेश करूंगा।
-
पंकज व्यास रतलाम

मध्य प्रदेश के धार जिले के बदनावर में यहां नागेश्वर मंदिर परिसर में स्थित शहीद गैलरी में भारत के अमर क्रांतिकारियों एवं अनाम शहीदों को याद करते हुए सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर उनकी आत्म शांति हेतु तर्पण एवं कर्मकांड कर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

प्रवीण जाखड़ जी और संगीता पुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है....

जल्द एक पोस्ट पुब्लिश करूंगा

प्रवीण जाखड़ जी और

Monday, September 21, 2009

नवरात्र व् ईद कि शुभ - कामनाएं.....

ईद की कोटि कोटि शुभ कामनाएं....
न हो मन में बेर-भावनाएं....
रहें हम पाक- पावन,
ऐसी हो हम सबकी भावनाएं...

खुदा का नूर हो, नवरात्र का सुरूर हो
न कोई दिल से दूर हो,
ऐसी करें हम माँ की आराधना
कि ही हर ओर माँ की महिमा का गान हो...


नवरात्र व् ईद कि शुभ - कामनाएं.....

Sunday, September 20, 2009

मोबाइल में ईनाम का मैसेज, कहीं पछताना न पड़ जाए

mobile मोबाइल में ईनाम का मैसेज, कहीं पछताना न पड़ जाएआप उन खबरों को भूले तो नहीं होंगे, जिनमें ई-मेल के माध्यम से ठगने की घटनाएं प्रकाश में आई थीं। लेकिन, आने वाले दिनों में ठगी के ऐसे प्रकरण सामने आए, जिनका कारण मोबाइल का इन-बॉक्स रहा हो, जो कोई आश्चर्य नहीं। कारण, जिस तरह के मेल ई-मेल पर मिलते रहे हैं, उसी तरह के संदेश अब मोबाइल पर आने शुरू हो गए हैं।

Saturday, September 12, 2009

पांच फीट की लौकियां


बदनावर जिला धर में आदिवासी कृषक मांगूजी गामड़ के कालेज के सामने स्थित कृषि भूमि में पांच फीट की लौकियां (आल) उपजी हैं। कृषक मांगू गामड़ ने हाईब्रिड बीज बाहर से बुलवाकर बोए थे। अब इन बेलों में पांच फीट लम्बाई की कई लौकियां बढ़ रही हंै। इन्हें बेचने की बजाए बीज के लिए सहेज कर रखा गया है।

Thursday, September 10, 2009

व्यंग्य: क्या करें, ये मास्टर मानते ही नहीं...

पंकज व्यास, रतलाम
क्या करें साब! ये लोग तो ऐसे नाक-भौं सिंकोड़ रहे हैं, जैसे बहुत बड़़ी बात हो गई हो। शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों पर लाठी चार्ज क्या कर दिया, मानो पहाड़ टूट गया, आसमान फट गया, जिसको देखों वो सरकार की आलोचना करने में लगा है। कोई ताने कस रहा है, तो कोई व्यंग्य कर रहा है।

Wednesday, September 9, 2009

धन्यवाद, आभार ब्लॉगवाणी

ब्लोग्वानी की टीम का बहूत बहूत धन्यवाद, जो उसने मेरे ब्लॉग को ब्लोग्वानी पर शामिल किया। पुनः धन्यवाद...
पंकज व्यास, रतलाम

Monday, September 7, 2009

अब नहीं सुनाई देते संझा के गीत

-पंकज व्यास
श्राद्ध पक्ष चल रहा है, साथ ही संझा पर्व का वक्त भी। सांझ के वक्त मदमस्त चलती बयारों के बीच अगर आपका मन मयुर हो उठे और मन करे चित्ताकर्षक हाथ से बनाई संझा के दर्शन की, इच्छा हो संझा गीतों को सुनने की, तो आपको मशक्कत करनी पड़ सकती है, क्योंकि आपकी ये चाहत सहज में पूरी नहीं हो सकती।

अब ‘संझा’ के लिए बच्चियों, लड़कियों, युवतियों के पास वक्त नहीं है। उन्हें अब पढ़ाई की टेंशन है, उनका ध्यान अब कॅरियर की ओर है और फिर संझा बनाना, मनाना और संझा के गीत गाना अब पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है। यही कारण है कि शहर की पॉस कॉलोनियों में नहीं, निम्नमध्यमर्गीय कॉलोनियों में वह भी बहुतायात में नहीं कहीं-कहीं रस्म अदायगी के लिए संझा बनाई हुई नहीं, चिपकाई हुई मिलेगी। कहीं आपको गीत सुनाई दे तो आपका नसीब और आपको गोबर द्वारा हाथ से बनाई संझा के दर्शन हो जाएं तो आप भाग्यशाली, सौभाग्यशाली! स्पष्ट है संझा पर्व विलुप्ति के कगार पर खड़ा है।

एक वक्त था जब श्राध्द पक्ष में सांझ ढलने को होती और बालिकाएं, लड़कियां, युवतियां संझा की आरती की तैयारी करने लगतीं, घर की दिवार पर चौकुनाकार में गोबर से लीप कर संझा बनाना शुरू करतीं, उस पर फूल पंखुडियां आदि लगातीं, सजातीं और मोहल्ले भर की सहेलियों को बुलाकर संझा के गीत गातीं, आरती उतारतीं, प्रसाद बांटतीं और फिर दूसरी सहेली के घर जाकर वहां भी इस क्रम को दोहराती। दूसरे दिन फिर से दिवाल के उस स्थान को लीपा जाता, जहां संझा बनाई जाती थी और फिर नई संझा बनातीं और फिर वहीं क्रम चलता… रोज नई संझा बनती…

वक्त बदला, वक्त के साथ-साथ लोगों का नजरिया बदला और गोबर से बनने वाली संझा का स्थान बाजार में मिलने वाले प्रिंटेड संझा के पाने ने ले लिया। संझा के पाने ने रोज-रोज गोबर में हाथ करने की मशक्कत को बचा लिया या यूं कही सृजनात्मकता को गृहण लगायाञ रोज रोज संझा बनाने की अब जरूरत नहीं पड़तीं थी, क्योंकि एक ही पाना रोज काम में आ जाता है। फिर भी लड़कियों, युवतियों, बालिकाओं में संझा के प्रति उत्साह बरकरा रहता। चाहे संझा के पाने ने गोबर द्वारा हाथ से बनाई जाने वाली संझा का स्थान ले लिया हो, लेकिन सांझ ढलते ही संझा के गीत मस्त बयारों के बीच सुनाई देने लग जाते।

स्पष्ट रूप से संझा के दो रूप सामने आए, एक ही मोहल्ले में कहीं हाथ से बनाई गई गोबर की संझा की आरती होती, तो कहीं प्रिंटेड पोस्टररूपी संझा की आरती, लेकिन गीतों दौर बदस्तूर जारी रहता।

फिर बदला वक्त, वक्त के साथ लोगों की सोच बदली। अब अभिभावकों के साथ बच्चों का ध्यान केन्द्रित हुआ केरियर की ओर। बच्चों पर बढ़ा पढ़ाई का दबाव। जाहिर सी बात है, संझा पर्व पर भी पढ़ा इसका प्रभाव। अब लड़कियों, युवतियों, बच्चियों को पढ़ाई की चिंता सताती है। उनके पास वक्त इतना वक्त नहीं है कि संझा के गीता गा लें, इतना टाईम नहीं है कि संझा और कॅरियर दोनों पर भी ध्यान दे लें और संझा के गीत भी याद कर लें।

आज के समय में गोबर से बनी संझा के दर्शन शायद ही किसी के हो, पूरी तरह से बनाई जाने वाली संझा का स्थान रेडिमेड संझा के पाने ने ले लिया है। बीच के दौर में जैसे कहीं गोबर की हाथ से बनाई हुई, तो कहीं रेडीमेड संझा देखने को मिल जाती थी, ठीक ऐसे ही कहीं आज संझा के पोस्टर मिलेंगे, तो कहीं संझा मनाई और बनाई ही नहीं जा रही है।

अगर कहीं पर संझा बनाई जा रही है, और गीत गाने का समय है, तो जल्दी-जल्दी में गीत गा लिए, नहीं तो फटाफट आरती कर ली और फिर अपने काम पर लग गए।

बहुतायात में अब संझा के गीत गली मोहल्लों में नहीं गुंजते हैं, अब बस रस्म अदायगी के लिए संझा की पूजा-आरती होती है, वह भी कम ही जगह पर। हालांकि, गांवों में आज भी कहीं संझा के गीत सुनाई, तो देते हैं, लेकिन वहां भी वो उत्साह, उमंग देखने को नहीं मिलता, जो कभी मिलता था।

आज के समय में स्पष्ट रूप से गोबर की बनाई हुई संझा का स्थान बाजार में मिलने वाले रेडिमेड प्रिंटेड संझा के पाने ने ले लिया है। शायद ही कोई को जिसके पास गोबर द्वारा हाथ से बनाई गई संझा का छाया चित्र भी हो। होगा कहां से संझा का स्वरूप बदल गया है।

अभी वो दौर चल रहा है, जिसमें हाथ से बनाई गई संझा विलुप्त सी हो गई है, अब चित्ताकर्षक संझा देखने को नहीं मिलती। संझा के गीत शाम के समय बहुतायात में सुनाई नहीं देते, कुछ जगहों पर ही संझा गीत की रस्म अदायगी की जाती है। पढ़ाई और केरियर का टेंशन जो रहता है।

अगर यही दौर बदस्तुर जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब संझा पर्व इतिहास की बात हो जाएगा। जैसे हाथ से बनाई हुई चित्ताकर्षक संझा के दर्शन दुर्लभ हो गए है, जैसे संझा गीत बहुतायात में सुनाई नहीं देते, ठीक वैसे ही वह दौर भी आ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं हो, जब कहीं-कहीं संझा के पाने तो दिखें, लेकिन गीत गाने का थोड़ा भी समय न हो। भविष्य में आरती-पूजन की रस्म अदायगी भी हो जाए, तो बड़ी बात होगी।

पॉश कॉलोनियों से संझा हुई नदारद

अब रस्म अदायगी के लिए संझा बनाई (माफ कीजिए चिपकाई) जाती है, तो निम्न व मध्यमवर्गीय कही जाने वाली कॉलोनियों में। पॉश कॉलोनियों से संझा नदारद हो गई है। साफ है, संझा के गीत गाना, बनाना, मनाना पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है। सभ्रांत कहे जाने वाली परिवारों की लड़कियों के पास न तो वक्त है, न संझा बनाने, मनाने और गीत गाने की ईच्छा।

संझा गीत

संजा जीम ले, चुठ ले, थने जिमऊं मैं सारी रात, चट्टक चांदी सी रात, फूला भरी रे परात, एक फूलो टूट ग्या, संजा माता रूठ गी…

काजल टीकी लो भई, काजल टिकी लो,, काजल तिटकी लइने म्हारी संजा बाई ने दो, संजा बाई को सासरों, सांगा में, पद्म पदानी बड़ी अजमेर…

मैं कोट चड़ा चढ़ देखूं म्हारो कौन सो वीरो आयो, चांद-सूरज वीरो आयो, घोड़ा पे बैठी ने आयो…

संजा वो की, सोली वो…. आदि गीत शाम के वक्त सुनाई देने शुरू हो गए हैं।

-पंकज व्यास

Thursday, August 13, 2009

बाकी दिनों तो भारत मां की छाती पर मूंग दला है।

15 अगस्त आ गया है,
लोगों में देशभक्ति का नशा छा गया है,

नेता विकास क ी बात क र रहा है,
हकीक त में वह खुद का विकास क र रहा है,

पुलिस देश प्रेम, जन सेवा का संकल्प ले रही है,
दूसरे ही पल भक्षक का रूप दिखा रही है,

मास्टर बच्चों को ईमानदारी की घुट्टïी पिला रहा है,
दूसरे ही दिन स्कूल से तड़ी मार रहा है,

भ्रष्टïाचार को खत्म करने क ी क समें खाई जा रही है,
लेकिन भ्रष्टïाचार क ो शिष्टïाचार बनाने की जुगाड़ भीड़ रही है,

देशभक्ति क े तराने बजाकर, देशभक्ति की बातें क रते हैं,
मैं कहता हूं हमने तो देश भक्त होने के मुगालते पाले हैं,
सब ढक ोसला है, दो दिन 15 अगस्त, 26 जनवरी को तिरंगा लहराया है,
बाकी तो सबने हिन्दूस्तान को छला है,
इन दो दिनों भारत मां के े नाम की कसमें खाई है,
बाकी दिनों तो भारत मां की छाती पर मूंग दला है।

वृक्षारोपण कैसे करते हैं साब?

पंकज व्यास, रतलाम
आजकल बड़ा जोर हैं वृक्षा रोपण का। गांव-गांव, शहर-शहर वृक्षारोपण हो रहा है। अखबार पटे हुए हैं वृक्षारोपण की खबरों से। अलां जगह वृक्षारोपण हुआ, फलां जगह वृक्षारोपण हुआ।
एक दिन एक व्यक्ति आकर मुझे बोला-क्यों भई वृक्षारोपण किया कि नहीं?ï मैंने कहा- वृक्षारोपण करते कैसे है? पहले यह तो बता दीजिए। वह बोला देखा नहीं सब वृक्षारोपण कर रहे हैं।
मैंने कहा- वृक्ष तो रौंपे-रोपाए हैं, उन्हें रोपने की क्या जरूरत है।
वह बोला- मैं समझा नहीं!
मैंने कहा- वृक्ष तो ऑलरेडी खड़े हुए हैं। मान लो उन्हें रौपना भी चाहें, तो कैसे रोपेंगे। इतने बड़े-बड़े वृक्षों को कैसे उठाएंगे, कैसे रोपेंगे..?
वह व्यक्ति बोला- मैं उन वृक्षों की बात थोड़ी कर रहा हूं। पौधों की बात कर रहा हूूं। वृक्ष कोई रौंपे जाएंगे। पौधे रौपें जाएंगे।
मैंने कहा- जब आप पौधे रोंप रहे हैं, पौधा-रोपण कर रहे हैं तो वृक्षा रोपण क्यों बोल रहे हैं। पौधा रोपण बोलिए ना।
वह व्यक्ति हो..हो..हो.. करके हंसने लगा और कहा- तुम भी यार!
बंधुओं वह व्यक्ति तो मेरी बात पर हंसने लगा। अब आप क्या करते हैं आप जाने। पौधा रोपण को पौधा रोपण कहते हैं या वृक्षा रोपण ये आप ही जाने...। मैं गलत हूं तो बताईए?

Monday, July 13, 2009

अंहकार ही मनुष्य के े पतन का कारण-श्री राजरत्नविजयजी

अंहकार ही मनुष्य के े पतन का कारण-श्री राजरत्नविजयजी
.>> आशीष पोरवाल
रतलाम। मुनिराज राजरत्नविजयजी म.सा. ने धर्मसभा में कहा कि अंहकार मनुष्य को पतन के े गर्त में ले जाता है। जलन, द्वेष, अहम, राग-रस, अंहकार के आभूषण है।
आपने कहा कि अंहकारी का अच्छा बनने में खुश नहीं,अच्छा दिखने में खुश्। स्वार्थसिद्धी के लिए परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन होता है। अहंकार वहां अहम नदारद है। अहंकार क कारण नाक का सवाल उठाकर संपूर्ण (अरिहंत) जगत में संघर्ष व्याप्त है। धर्मसभा में मैत्रीकुंभ (नवकार कलश) को श्रद्धालुओं ने अभिमंत्रित वासक्षेप से भर दिया। पश्चात १२ नवकार का जाप किया गया। यह कलश नवकार के जाप के े लिए धर्मालुजन घर-घर ले जाएंगे, वहां सामूहिक जाप द्वारा लाखों-करोड़ों नवकार का जाप होगा। संघ के े पारस भण्डारी ने बताया कि मैत्री कुंभ के लाभार्थी समीरमल ललवानी परिवार एवं मैत्रीकुंभ घर के े लिए चांदमल ज्ञानचंदजी सुराणा परिवार है।

Monday, April 13, 2009

गर चाहते हों, जूता जनता का हथियार न बनें, तो जनता को तवज्जो दो

पंकज व्यास, रतलाम
गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर पत्रकार ने जूता फेंका, घटना जन-मन के मानस पटल से धूमिल ही नहीं हुई कि एक शिक्षक ने कांग्रेस नेता नवीन जिंदल पर जूता फेंका।
गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर पत्रकार ने जूता फेंका, घटना जन-मन के मानस पटल से धूमिल ही नहीं हुई कि एक शिक्षक ने कांग्रेस नेता नवीन जिंदल पर जूता फेंका। आदर्शों की बात करें तो विरोध का यह तरीका उचित नहीं कहा जा सकता है, निदंनीय है। लेकिन, जनरैलसिंह ने जो जूता फैंका उसकी जो प्रतिक्रियाएं हुई, उनमें स्पष्टïत: इसे समर्थन देने वालों की तादाद ज्यादा रही और विरोध करने वालो की संख्या कम। इसका एक नमूना देखना है, तो आप ब्लॉगर्स की दुनिया में चले जाइए। ये इस बात का संकेत हैं कि लोगों में व्यवस्था के खिलाफ कितना आक्रोश है।पत्रकार ने जूता फैंका तो कहा जा सकता है कि पत्रकार को ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन शिक्षक ने फेंका तो क्या कहा जाएगा? और लोगों ने जो इस जूते का महिमा मंडन किया, इस घटना का समर्थन किया उन लोगों के बारे में क्या कहोंगे? और यही जूता अगर जनता के हाथ में आ गया तो क्या कहोंगे? ऐसा न हो इसके लिए कदम उठाया जाना चाहिए। स्पष्टï है कमी कहीं न कहीं नेताओं के चरित्र में आई है। नेताओं की जनता के प्रति प्रतिबद्घता कम हुई है। विरोध करने के सर्वमान्य तरिकों को तवज्जो नहीं दी जा रही है। आए दिन कितने ही ज्ञापन जनता नेता के नाम देती हैं, कितने ही लोग समाचार-पत्रों के माध्यम से अपनी आवाज उठाते हैं, लोग धरने देते हैं, रैली निकालते हैं, लेकिन जनता की मांग पर पर कार्रवाई करने की बात तो दूर उन्हें तवज्ज्जो देने की फुरसत किसे हैं? राजनेता राजनीति में मस्त है। विकास के लिए राजनीति नहीं, राजनीति के लिए विकास हो रहा है। राजनीति सेवा करने का नहीं, मेवा खाने भर का माध्यम बनकर रह गई है। इसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। आपके अपने क्षेत्र के सांसद ने पांच साल में जनता के लिए क्या किया, इसका ही हिसाब लगा लिया जाए। कोई सांसद पांच साल में किए गए पांच काम भी बता दें, तो बहुत बड़ी बात होगी। उनमें भी धरातल पर कितने हुए, उनकी तो बात ही मत कीजिए। कहीं कार्य स्वीकृत भर हुए, तो कही सर्वे हुए हैं, जनता आउटपुट चाहती हैंं जनाब, आउटपुट, कागजों में, आंकड़ों में किए गए विकास कार्यों से जनता को कोई मतलब नहीं होता है, उन्हें तो बताओ कि ये देखों हमने ये काम किया है...। अगर सांसद सरकार में रही पार्टी से नहीं है, तो उसके पास तो सीधा-सा बहाना होता है कि सरकार हमारी नहीं थी। लेकिन, सवाल ये हैं कि सांसद निधि तो थी, उसका क्या किया?जूते फेंकने जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए जरूरी है कि नेता जनता का ख्याल करना त्वरित प्रभाव से शुरू करें, विरोध के सर्वमान्य तरीकों को तवज्जों दी जाए, ज्ञापन देने के बाद, धरनों के बाद, रैलियों के बाद समाचार पत्रों में आवाज उठाने के बाद सरकार जनता के लिए क्या कर रही है, क्या नहीं कर रही है, यह स्पष्टï किया जाए, नेता जनता को बेवकूफ समझना बंद करें। तो ही लोकतंत्र सही मायने में सफल हो सकता है। वरना, तो जनता की आवाज को, आक्रोश को, विचारों को दबाया जा सकता है, लेकिन उन्हें नष्टï नहीं किया जा सकता।

Monday, March 23, 2009

english-4 all, come please

english-4 all par आज से मैनें इंग्लिश सीखने सम्बन्धी पोस्ट लिखनी स्टार्ट कर दी है। काफी दिन से लिखने की इच्छा थी, लेकिन कुछ वयस्तता की वजह से लिखना स्टार्ट नही हो पा रहा था।

आज से पोस्ट स्टार्ट की है। उम्मीद है आपके सहयोग से निरंतरता बनी रहेंगी।


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Wednesday, March 4, 2009

ईश्वर का पुत्र

(नेट पर विचरण करते-करते मेरी निगाह एक इसे आलेख पर गई, जिसने मुझे इसे ब्लॉग पर पोस्ट कराने पर विवास कर दीया। इस लेखा को यहाँ से लिया है। आप इसे अवस्य पड़े। ईसा के बारे में इस तरह के विचार पहली बार पड़े है। आप भी.....)
ईश्वर का पुत्र
ईसाई धर्म में जीससका क्या स्थान है, इससे हर कोई भलीभांति परिचित है। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि जीससको केवल इसलिए सूली पर चढा दिया गया था, क्योंकि वे खुद को ईश्वर का पुत्र मानते थे।
दरअसल, रोमन साम्राज्य के अंतर्गत आता था जीससका देश जूडिया।रोमन गवर्नर पांटियसपायलट की एक पागल व निर्दोष व्यक्ति को सूली पर चढाने में कोई रुचि नहीं थी। एक ऐसा आदमी, जो दावा करता था कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं।
दरअसल, उसे अधिकतर लोग पागल ही मानते थे। लेकिन वह किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था। पांटियसपायलट ने माना कि जीससनिर्दोष हैं और उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। यदि उन्हें इस विचार से आनंद मिलता है कि वह ईश्वर का एकमात्र पुत्र है, तो उन्हें ऐसा सोचने देना चाहिए।
वास्तव में, यदि आपके मन में ईष्र्या के भाव पैदा हो रहे हैं, तभी दूसरे प्रकार के विचार आ सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति सोचे कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं, तो उस व्यक्ति के प्रति विरोध प्रकट करने का सवाल ही नहीं उठता है! क्योंकि किसी भी व्यक्ति के पास इस बात का कोई ठोस प्रमाण ही नहीं है कि वह ईश्वर का पुत्र है या नहीं! व्यक्ति न केवल ईश्वर का पिता हो सकता है, बल्कि वह ईश्वर का पुत्र और भाई भी हो सकता है। यह व्यक्ति मात्र की कल्पना हो सकती है। यदि आप किसी व्यक्ति से मिलते हैं और वह आपसे कहता है कि वह ईश्वर का पुत्र है, तो क्या आप यह सोचते हैं कि उस व्यक्ति को सूली पर चढा देना चाहिए?
संभव है कि आप यह सोचें कि सामने वाला व्यक्ति अपनी राह से भटक गया है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उसे सूली पर चढा दिया जाए। सच तो यह है कि उस व्यक्ति को आनंद मनाने का पूरा अधिकार है। अब यदि दूसरे शब्दों में कहें, तो आपको उस व्यक्ति का उत्साह और बढाना चाहिए, क्योंकि ईश्वर को पाना बहुत कठिन है और आपने ईश्वर के रूप में पिता को पा लिया है। यह संभव है कि वह आपको ईश्वर के ठिकाने का कोई संकेत बता दे।
जीससने किसी व्यक्ति को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। एक शहर से दूसरे शहर में जाकर यह कहना कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं, यह कोई अपराध नहीं है। लेकिन यह यहूदियों के स्वाभिमान के लिए खतरनाक था, क्योंकि एक गरीब इनसान उनसे कह रहा था कि वह ईश्वर का पुत्र है! अन्यथा यह एक निर्दोष मामला था, उस बेचारे पर तनिक भी क्रोध प्रकट करने की कोई आवश्यकता नहीं थी! दरअसल, जीससको एक कुशल मनोचिकित्सककी आवश्यकता थी। अच्छी देखभाल से उनका यह पागलपन दूर हो सकता था। उन्हें सिर्फ प्यार, उपचार और देखभाल की जरूरत थी। इसके बाद वे पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते और अपने विचारों पर स्वयं हंसते। वास्तव में, आपको अपने सभी विश्वासों और आस्थाओं का त्याग करना होगा।
आपको स्वच्छ और बोझ-रहित होना होगा, क्योंकि आप शिखर को छूने जा रहे हैं। ये सारे बोझ आपकी प्रगति को बाधित कर देंगे। आप सत्य को जानने जा रहे हैं, इसलिए सत्य के संबंध में किसी धारणा को मत ढोएं, क्योंकि यही धारणा आपके और सत्य के बीच में अवरोध बन जाएगी। -[ओशो]
-[द बुद्धा:दएंप्टीनेसऑफ दिहार्ट]

Thursday, February 26, 2009

इंग्लिश क्लास कमिंग सून....

इंग्लिश क्लास कमिंग सून....
लीजिये, आपकी खिदमत में हाजिर है english-4all. आपका वेल-कम। शीघ्र यहाँ आप-हम शुरू करेंगें ऑनलाइन इंग्लिश क्लास। क्या आप है तैयार ? आप भी रहें रेडी और अपने दोस्तों को भी कर लें तैयार।

Tuesday, February 24, 2009

व्यवस्था में कमी पर लिखेंगें तो भी क्या मान हानि आड़े आएँगी

व्यवस्था में कमी पर लिखेंगें तो भी क्या मान हानि आड़े आएँगी

किसी का मन दुखाना हमारा मकसद न हो, किसी के सम्मान को हनी पहूचना हमारा इरादा न हो, और व्यवस्था की कमी को इंगित करना हमारा लक्ष्य हो तो क्या कोई मान हानि लगेंगी। व्यवस्था में कमी पर लिखेंगें तो भी क्या मान हानि आड़े आएँगी? ये प्रश्न मेरे जेहन में उठा रहा है और मुझे परेशां कर रहा हैं।
इस मामले में क्या?

Friday, February 20, 2009

इसलिये यह ब्लॉग बनाया है

मेरा ब्लॉग आप-हम में न जाने क्या हो गया है, उसकी पोस्ट ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत पर पुब्लिश नहीं होती। काफी मशक्कत की लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अंततः यहाँ ब्लॉग बनाना पड़ा। अब यहाँ मिलेंगे। हालाँकि, मैं कोशिश कर रहा हूँ, अगर सब कुछ ठीकठाक हो गया तो वहां भी मिलेंगें। टेक्नीकल बंधुयों से गुजारिश है- कोई मदद हो सके तो करें।


aapka pankaj vyas ratlam