Monday, November 9, 2009

तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका

 (नोट- यह आर्टिकल प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है मुझे तो कुछ गुजरना है..., का ही भाग है, किन्हीं कारणों से हेडिंग को बदला है। इस आर्टिकल में जानबुझकर प्रवीण जाखड़ जी व संगीतापुरीजी के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन इसे आप प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है... लेखमाला के तारतम्य में ही देखें। बाकी बातों की चर्चा लेखमाला की अगले व अंतिम भाग में करेंगे। फिलहाल तो आप इस आर्टिकल को पढ़ें। लेख बड़ा जरूर है, लेकिन   निवेदन यही कि पढ़कर अपना मत जरूर बताएं। धन्यवाद    -पंकज व्यास, रतलाम)
 तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका
आज ज्योतिष और ज्योतिषियों के हाल किसी से छूपे नहीं हैं, ज्योतिष की सही एवं सटिक भविष्यवाणी यदा-कदा ही देखने को मिलती है।  कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास  मानते हैं, इसका कारण तथाकथित ज्योतिषों द्वारा ठगा जाना रहा है और इसी कारण वे सवाल उठाते हैं। ज्योतिषी उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाते हैं। स्पष्टï है ज्योतिष के जानकारों की कमी है और तथाकथित लोगों को ठगने वाले ज्योतिषयों की भरमार। ज्योतिष की यह दशा क्यों हुई? ज्योतिष की सही व सटिक भविष्यवाणियां अब क्योंं नहीं हो पाती?  ऐसे ही सवालों को जानने का जतन करेेंगे हम।

सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि ज्योतिषी कोई भगवान नहीं होता है। असल में होता क्या है कि जब हमारे जेहन में ज्योतिष की तस्वीर उभरती है, तो हमारी आशाएं बढ़ जाती है, हममें अपने व हर क्षेत्र के भविष्य को जानने की उत्कंठा जाग्रत हो जाती है। यही कारण है कि जब ज्योतिष का जिक्र होता है, तो हम ज्योतिषी से कई अपेक्षा लगा बैठते हैं और जाहिर कि वह सर्वज्ञ नहीं होता है, इसलिए हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है। हर एक की सीमा होती है और यही बात ज्योतिष पर भी लागू होती है। हमें उन सीमाओं को समझते हुए ज्योतिष को देखना होगा।

ज्योतिष के आज के हालातों को जानने के लिए हमें पुरातन युग में जाना होगा। उस युग में जिसने कई ज्योतिर्विद हमें दिए। उस वक्त की तस्वीर अपनी आंखों के सामने लाईए, जब विज्ञान नहीं था, लेकिन ज्योतिर्विदों ने यह बता दिया था कि ग्रह नौ होते हैं नव गृह।

ज्योतिष का जन्म जिज्ञासा का परिणाम है। हमें अपने भविष्य को जानने की जिज्ञासा जगी, हमें इस संसार, ब्रह्मïांडको जानने की जिज्ञासा जगी। उसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ऋषि-मुनि ध्यान की गहराईयों में गए, अपने सूक्ष्म शरीर को पार्थिव शरीर से जूदा कर ब्रह्मïांड में विचरण किया और इस तरह उन्हें पता चला कि ग्रह नौ होते हैं। और यही से होती है जोयोतिश कि शुरुआत...

हमें यह समझना होगा कि पुरातन युग में जो ज्योर्तिर्विद सटिक भविष्यवाणी करने के लिए ख्यात होते थे, वे ध्यान, योग विधा में माहिर हुआ करते थे। यहां मैं एक निवेदन करना चाहता हूं कि सटिक भविष्यवाणी के लिए केवल ज्योतिष का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसके लिए योग, ध्यान, आभास , छठी इंद्रिय का सक्रिय होना आदि भी हो तो सोने पे सुहागा। कई चीजों का एक साथ अध्ययन करके सटिक भविष्यवाणी की जा सकती है।

आज के ज्योतिष की गत और उसके हालातों को जानने के लिए हमें प्रसिद्घ पुरातन ज्योतिषियों की पृष्ठïभूमि में जाना होगा। हमें पुरातन व्यवस्था को समझना होगा। चलिए पुरातन युग में...

उस युग में राज्य बाकायदा ज्योतिष जैसी विधा को सम्मान की नजर से देखता था और जो कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधा को समर्पित होना चाहता या पता चलता कि अला व्यक्ति में या फलां व्यक्ति में संभावना है, तो उसे सम्मान तो देता ही, साथ ही उसे जीविकोपार्जन की व्यवस्था से मुक्त करता। याने उसके जीवन की  आवश्यक व्यवस्था राज्य करता था और अध्ययन की व्यवस्था करता। उस वक्त ज्योतिष के लिए वातावरण था।

अब गुरु से ज्ञान प्राप्त कर जब विद्वान व्यक्ति समाज में जाता, तो उसकी विद्वता का प्रतिसाद मिलता और राजा, महाराजा, मुखिया उसे सम्मान देते। वह निश्चिंतता से भविष्यवाणी कर सकता था। ज्योतिषी को रोजीरोटी की चिंता नहीं होती थी, उसका एकमात्र काम मनोयोग से ज्योतिर्विज्ञान की सेवा करना, शोध करना आदि होता था। जब रोजी रोटी की चिंता नहीं, तो फिर ज्योतिष की सेवा, शोध और सटिक भविष्यवाणी तो होगी ही। धीरे धीरे यहाँ व्यवस्था खत्म होती चली गई उसका प्रभाव ज्योतिष जैसी विधाओं पर भी पड़ा....

अब बात करें आज के परिदृश्य की तो आज क्या हालात हैं, सबको मालूम है। राज्य की तरफ से ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को प्रश्रय, आश्रय देने की क्या व्यवस्था हो रही है? सब जानते हैं। इस हकीकत से हर किसी को वाकिफ होना चाहिए कि अगर कोई ज्योतिष जैसे विषय का अध्ययन करना चाहे, तो उसे अध्ययन के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। उसे शोध के लिए माहौल देना तो दूर, सुविधाएं देना तो दूर जाने अनजाने में हम उसकी राह में रोड़ा  बन जाते हैं। उसके सामने रोजी रोटी की समस्या होती है, जो उसे ज्योतिष  के अध्ययन के वक्त विचलित करती है, यह यह समस्या विचलित तो करेगी ही।

एक पहलू यह भी है कि शोध करने वाले ज्योतिषी जब शोध करते हैं और कोई भविष्यवाणी करते हैं और यदि वह गलत निकल जाती है, तो व उसे अपने अहम् का विषय बना लेते हैं और किसी न किसी तरिके से अपने आपको सही ठहराने की तरकिबे भिड़ाते हैं और उसी में वे उलझ कर रह जाते हैं।

ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि यदि कोई भविष्यवाणी गलत सिद्घ होती है, तो आप उसे स्वीकार करें और मानें कि  आप से गलती हुई है। निवेदन यह भी कर देना चाहता हूं कि आप शोध के दौरान अपनी भविष्यवाणियों को इस रूप में भी पेश कर सकते हैं कि  मैंने भविष्यवाणी की है, शोध जारी है, भविष्यवाणी कितनी सफल होती  है, भविष्य पर निर्भर करेगा, आप देखिए कि मेंरी भविष्यवाणी सफल होती है या नहीं?

तमाम ज्योतिष के शोधार्थियों से, जानकारों से निवेदन और उन लोगों से भी निवेदन जो सवाल करते हैं कि शोध जब होता है, तो उसमें कई बार सफलता मिलती है,  तो कई बार असफलता का मुंह भी देखना पड़ता है। इसका मतलब शोध में कमी रही है।कमियों को दूर किया जाए,शोध को आगे बढ़ाया जाए।

जो ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी विधाओं के लिए सम्मान भी उनमें  बरकरा है, उन तमाम लोगों के बहाने सबसे सवाल करना चाहता हूं कि उदाहरण के लिए कोई ऊर्दू सीखना चाहे, अंग्रेजी सीखना चाहे, कुरान पढऩा चाहे, बाईबिल पढऩा चाहे, तो उसे पर्याप्त मार्गदर्शन व व्यवस्था करने वाले मौजूद हैं, पूरी की पूरी व्यवस्था है, जो प्रोत्साहन देती है, लेकिन कोई किसी भारतीय विधा का सांगोपांग अध्ययन करना चाहे, तो उसके लिए क्यों कोई व्यवस्था नहीं? क्यों? ज्योतिष तो दूर कोई केवल एक भाषा, संस्कृत सीखना चाहे, तो उसके लिए क्या व्यवस्था आसानी से हो जाती है? एक तरफ तो व्यवस्था नहीं, दूसरी तरफ रोजी-रोटी की समस्या मुंह बाएं खड़ी रहती है, तो फिर नि:स्वार्थ भाव से ज्योतिष जैसी विधाओं की सेवा कैसे होगी?

ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कि  वे अपने शोध को शोध के रूप में पेश करें, बजाय दावे करने के। वे खूद समझें कि केवल ज्योतिष से काम चलने वाला नहीं है, भविष्यवाणी के लिए आभास, छठि इंद्रीय, ध्यान, योग आदि की आवश्यकता होती है। वे इस बात को समझने की कोशिश करें  कि यह वह पुरातन युग नहीं है, जिसे भारतीय विधाओं का स्वर्णीम युग कहा जा सकता है। इस युग के हिसाब से हमें चलना होगा और बजाए भविष्यवाणियों के नाम पर दावे करने के, हमें भविष्यवाणी को शोध के रूप में पेश करना होगा और यदि शोध गलत होता है, तो उसे मानना होगा और सुधार करना होगा।

एक निवेदन ज्योतिर्विज्ञान पर सवाल उठाने वालों से कि केवल सवाल उठाने से काम नहीं चलने वाला है। जिस ज्योतिष जैसी विधा से आप प्रेम करते हैं, सम्मान देेते हैं,  उसके लिए आपने वातावरण बनाने के लिए क्या किया, इस पर भी विचार करना होगा।

मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हंू ज्योतिष जैसी विधाओं पर प्रश्न करने वालों से कि आप भारतीय विधाओं पर गर्व तो करते हैं, लेकिन क्या गर्व करने भर से काम चल जाएगा? क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि हम झूठे-पाखंडी ज्योतिषियों को तो बेनकाब करें ही, साथ ही ज्योतिषियों के शोधार्थियों के लिए, जो वास्तव में ज्योतिष जैसी विधाओं ·ो समर्पित हो जाना चाहते हैं, को प्रोत्साहन दें।

मैं समाज के प्रबुद्घवर्ग से, सामाजिक कार्यकर्ताओं से, बुद्घिजीवियों, धर्म-संस्कृति कि बात करने वालो से सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं कि क्यों हम ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना नहीं करते, जिसमें कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को कोई समर्पित होना चाहे, शोध करना चाहे, तो उसके लिए सारी व्यवस्था हो। क्यों न हम उसे रोजी रोटी की समस्या से मुक्त करें, जिससे वह निस्वार्थ भाव से पूरे मनोयोग से ज्योतिष जैसी विधाओं  पर शोध कर सके, उन्हें नए आयाम दे सके, उनकी सेवा कर सके, और समाज को लाभान्वित कर सके,  क्या ऐसी व्यवस्था  नहीं होना चाहिए?? जब वह रोजी-रोटी की समस्या से मुक्त होगा, तो ज्योतिष के नाम पर ठगने की समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।

मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाने वालों से कि आप क्या सवाल ही उठाते रहेंगे या कुछ करेंगे भी? कुछ न सही तो ज्योतिष जैसी  विधाओं के लिए वाताववरण ही बनाइए, जिसमें ये विधाएं पुष्पित, पल्लवित हो और इनकी खूशबू चहुंओर फैले। क्यों न ऐसा वातावरण बनाएं?

अंततोगत्वा ज्योतिष पर सवाल उठाने वालों और ज्योतिर्विदों दोनों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि वे अपनी भूमिका पर विचार कर सकते हैं तो करें और बेहतर होगा ज्योतिष जैसी विधा के लिए कि वे अपनी भूमिका बदलें।

अन्यथा तो यूं ही सवाल उठते रहेंगे, और यूं ही चलता रहेगा। नतीजा वही ढाक के तीन पात। शून्य बटा सन्नाटा। आप ही बताईए यही स्थिति रही तो कैसे होगी, सटिक व सही भविष्यवाणी?
>>पंकज व्यास, रतलाम 


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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2


प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

 

Monday, October 26, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

एक तरफ संगीतापुरी जैसे लोग हैं, जो भारतीय विधाओं जैसे ज्योतिष आदि के मूल तत्व को जानना चाहते हैं, समर्पित हो जाना चाहते हैं और तमाम आडंबरों व दकियानुसीता  को दूर फटकारते हुए ज्योतिष जैसी विधा को जन जन तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, तो दूसरी तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग हैं, जो ज्योतिष आदि भारतीय विधाओं पर गर्व करते हैं और यकिन भी करते हैं, लेकिन ज्योतिष के नाम पर चल रही दुकानदारी से उन्हें घीन है, जो ज्योतिष के नाम पर हो रही अंधश्रृद्घा और आडम्बर से नफ़रत करते है और इसीलिए जहां कहीं कुछ कमी हो जाती है, ये अपनी कलम के माध्यम से वार करने को बेताब नजर आते हैं, इन्हें तथ्य चाहिए होते हैं और जब इन्हें नहीं मिलते हैं तो ऐसे लोग खुला चेलेंज देते हैं और करते हंै सवालों की बौछार, जब इनको जवाब नहीं मिलता है, तो मुमकिन है कि ज्योतिष से इनकी आस्था धीरे-धीरे कम भी होती जाती है।
एक तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जो आडंबरों के धूर विरोधी, तो दूसरी तरफ संगीतापुरी जैसे लोग जिन्हें पुरातन विधाओं के मूल को सहजने और उसकी निरंतरता स्थापित करने में गहरी दिलचस्पी है, मगर इन दोनों व्यक्तित्वों के बीच ऐसे लोग भी हंै, जिन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं है, जो अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए ज्योतिष के नाम पर दुकानदारी चलाते हैं और सामने वाले को मुर्गा मान उसे फंसाने से पीछे नहीं हटते। असल में ये ही लोग होते हैं,  जिनके कारण भारतीय विधाएं और ज्योतिष बदनाम हैं।

दरअसल, जब प्रवीण जाखड़ जैसे लोग आडंबरों पर कुठाराघात करते हैं, तो  इन लोगों पर तो कोई असर नहीं होता है, वरन संगीतापुरी जैसे लोग निशाने पर आ जाते हैं। तब संगीतापुरी जैसे लोग व्यथित होते हैं, विचलित भी हो सकते हैं। ये व्यथित होते हैं, यही इसका प्रमाण है  कि ये आडंबरों के पोषक नहीं, वरन भारतीय विधाओं को स्थापित करने के लिए समर्पित होने वाले लोगों में से हैं, जबकि ज्योतिष के नाम पर मुर्गा मान लोगों को फांसने वालों पर इसका कोई असर नहीं होता है।

प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जब आडंबरों और कुरीतियों से पर लेखनी के माध्यम से कुठाराघात करते हैं,  सवाल उठाते हैं, तो  संगीतापुरी जैसे लोग जो अनुसंधान में लगे हैं, व्यथित  हो जाते हैं, विचलित हो जाते हैं, उनकी तन्मयता भंग हो जाती है और  फिर ये प्रवीण जाखड़ जैसे लोगों को अपना विरोधी मानने लग जाते हैं।  प्रवीण जाखड़ और संगीता पूरी जैसे लोग आपस में लड़ते झगड़ते रह जाते हैं और मजा दूसरे लोग मार जाते हैं और बदनाम ज्योतिष जैसी विधाएं होती रहती है?

अब स्पष्ट हो जाना चाहिए कि एक  तरफ   आडंबरों के धूर विरोधी हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग जो आडंबरों को दूर तो करना चाहते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं आदि को विश्व पटल से ओझल होते हुए भी नहीं देख सकते हैं और उसके मूल को सबके सामने लाना चाहते हैं। इनके बीच हैं ऐसे लोग जिनके  लिए ये सब दुकानदारी है, इनके कारण ज्योतिष जैसी विधाएं बदनाम हो रही है, और फिर ऐसे लोग भी तो हैं, जिनका मकसद ज्योतिष जैसी विधाओं को बदनाम करना ही है। वे ऐसे मौकों को और लोगों को ढूंढते रहते हैं, कि कहां कमी नजर आए और बदनाम करें...

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ ·र गुजरना है ...ये हेडिंग जब आपके सामने से गुजरती होगी आपके जेहन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि इन सबके बीच मुझे क्या कर गुजरना है? 
तो  मैं उन हालातों को आपके सामने लाना चाहता हंू, जिनके कारण संगीतापुरी जैसे लोग निशाने पर आते हैं। मैं उन हालातों को बताना चाहता हूं, जिनके कारण प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जब खुले तौर पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें उनका जवाब नहीं मिलता है?  क्यों जवाब नहीं मिलता हैï, यही बताने का जतन मैं करना चाहता हूँ...मैं उन सवालों को उठाना चाहता हूं, मैं उन कारणों को बताना चाहता हूं, जिनके कारण प्रवीण जाखड़ जैसे लोगों को उनके सवालों के जवाब नहीं मिलते और निशाने पर आ जाते हैं संगीतापुरी जैसे लोग।

यहां मैं सवाल छोड़ जाता हूं आपके लिए कि आखिर ऐसे क्या कारण रहे हैं, जो ज्योतिष जैसी विधा के जानकारों की कमी होती गई और आडंबरों की भरमार? क्यों होती गई ज्योतिष जैसी विधाओं की उपेक्षा और भारतीय विधाए बदनाम

हम मिलकर  करेंगे इसकी चर्चा ...आपकी चाहियें सहभागिता .....
पंकज व्यास रतलाम

Thursday, October 15, 2009

आओ बधाई दो.....

सबको बताई दे है, आज हमरा जनम दिन है,आओ हमको बधाई दो.....
साथ में कोई गिफ्ट -शिफ्ट दो, तो मजा आ जाये,
अगर आप हमको बधाई दो, तो मन प्रफुल्लित होई जाये,
तो दो ना बधाई,  खिलाओ न मिठाई .....
पंकज व्यास, रतलाम

Saturday, October 3, 2009

ब्लॉगवाणी को कुछ सुझाव

ब्लॉगवाणी को कुछ सुझाव
ब्लॉगवाणी को सुझाव सब दे रहे हैं। मैं मेरे मन-मानस में भी कुछ सुझाव आए हैं।  मैं यह नहीं जानता हूं कि व्यवहारिक रूप से इन पर अमल किया जाना संभव है या नहीं, लेकिन इस अकिंचन के कुछ सुझाव हैं जरूर, उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूं।

१. ब्लॉगवाणी में सर्च सुविधा नहीं है, उसे जोड़ा जा सकता है। विभिन्न प्रकार से सर्च करने की सुविधाएं जोड़ी जा सकतीं हैं।
2.  जो-जो ब्लॉग ब्लॉगवाणी पर रजिस्टर्ड है, उन्हें आपस में चेटिंग करने की सुविधा भी दी जा सकती है।
३. ब्लॉगवाणी की लोकप्रियता इतनी तो है, कि अगर ब्लॉगवाणी के संचालक चाहे तो सामाजिक सरोकारों के मुद्दों पर पहल कर सकते हैं। अच्छा लगेगा।
4. आप सब जानते हैं गुगल में हिन्दी ब्लॉग पर एड याने विज्ञापन देने की  सुविधा नहीं है। ब्लॉगवाणी के संचालक इस बात पर गौर कर सकते हैं कि क्यों न सीधे वे ही विज्ञापन लेना शुरू कर दें और ब्लॉग को एड सेंस दे दें। स्पष्टï रूप से  मैं यहां ब्लॉगवाणी के खुद के एड सेंस शुरू करने का सुझाव दे रहा हूं।

पंकज व्यास, रतलाम
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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

Tuesday, September 29, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1


  • बात संगीता पुरी जी की .
संगीता पुरी जी उन लोगों ी प्रतीक है, जो ऐसा मानते हैं कि वक्त के साथ भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म में कई बुराई आई हंै, लेकिन उन बुराईयों के बावजुद हिन्दू धर्म में अथाह ज्ञान का सागर है, उनका लक्ष्य है अच्छाई को देखना। ये उन लोगों में शुमार है, जो भारतीय विधाओं में बुराईयों को दरकिनार कर भारतीय विधाओं का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो चाहते हैं कि हिन्दू धर्म में छुपे हीरे-मोती को जनमानस के सामने लाया जाए।
संगीता पुरी जी उन लोगों में शामिल की जा सकती हंै, जो भारत की प्राचीन विधाओं पर गर्व करते हंै और भरपुर विश्वास भी करते हैं। फ़िर भी नवीनता लिए हुयें है....

बकौल संंगीतापुरी- परंपरागत ज्योतिष का जो जड़ है , वो है हमारे पूजनीय ऋषि , महर्षियों की निरंतर ी गयी मेहनत, जिसके फलस्वरूप प्राचीन काल से ही खगोल शास्त्र का इतना विकास हो सका था। उसी जड़ के आधार पर फलित ज्योतिष का पौध विकसित किया गया, जो पूर्ण तौर पर पल्लवित और पुष्पित होकर बड़ा वृक्ष बन अपनी सुगंधि बिखेरने लगा।

सगीतापुरी उन लोगों में शुमार है, जो न केवल भारतीय विधाओं पर विश्वास व गर्व करते हैं, वरन् उन्हें फ़िर से सुप्रतिष्ठिïत करने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं और ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नीत नए अनुसंधान कर देना चाहते हैं।

संगीतापुरी जी उन लोगों में सम्मिलित की जा सकतीं है, जो भारतीय वांगमय पर गर्व तो करते हैं, लेकिन किसी भी रूढ़ीवादिता को नहीं मानते, जो किसी ढोंग को, अंधविश्वास को तवज्जो नहीं देते, बल्कि केवल धर्म में, अध्यात्म में मुद्दे की बात ढूंढते हैं, अध्यात्म की बात, ज्ञान की बात ढूंढते हैं, ये ज्ञापन पिपासु

संगीतापुरीजी खुद अपने बारे में बतातीं है- अपने बारे में कुछ खास नहीं बताने को अभी तक ॥ ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकालने में सफ़लता पाते रहना ॥ बस सकारात्मक सोंच रखती हूं ॥ सकारात्मक काम करती हूं .. हर जगह सकारात्मक सोच देखना चाहती हूं ॥
आकाश को छूने के सपने हैं मेरे ॥ और उसे हकीकत में बदलने को प्रयासरत हूं ॥ सफलता का इंतजार है।

संगीतापुरीजी उन लोगों का प्रतिनिधित्व करतीं है, जो न केवल भारतीय धर्म, संस्कृति, वेद-वेदांग, उपांग, वांगमय पर न केवल गर्व करते हैं, वरन उसके अनुशंधान के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हुए समर्पित हो जाना चाहते हैं। संगीतापुरी जी अपने आपको समर्पित कर देना चाहतीं है ज्योतिष को। संगीतापुरीजी अपने शोक क·े बारे में बताते हुए लिखतीं है- हल्की फुल्की पुस्तकें या पत्र पत्रिकाएं .. जितनी भी मिल जाएं .. सब पढ लूंगी .. पर गंभीर अध्ययन सिर्फ ज्योतिष का।

जिस किसी ने भारतीय संस्कृति की पुरातन कलाओं का, विधाओं का थोड़ा भी अध्ययन किया होगा, वो जानता होगा कि भारत का पुरातन साहित्य कितना वृहद और विस्तृत रूप लिया है। उन वृहद और विस्तृत विधाओं में से संगीतापुरी जी ने एक को चुना और वह है ज्योतिष। और ज्योतिष का क्षेत्र भी बड़ा विस्तार लिए हुए हैं, उस वृहद ज्योतिष में से भी संगीतापुरीजी ने चुना ज्योतिष को।

माफ करना संगीतापुरीजी, एक निवेदन कर देना चाहता हूं इस निवेदन को भारतीय विधाओं पर प्रश्न उठाने वाले भी जरूर पढ़ लें। निवेदन है कि संगीतापुरीजी अगर/यदि आपने कोई भविष्यवाणी की और सही नहीं निकली तो उसमें ज्योतिष का दोष नहीं, आपकी चूक होती है। कहीं न कहीं भूल आप से होती है, आपके अध्ययन में कमी होती है, जो आपकी भविष्यवाणी को गलत सिद्घ करती है।

एक सरल सा उदाहरण देता हूं, जैसे कम्प्यूटर में किसी बेडसेक्टर की, वायरस वाली फाईल डाउनलोड कर ली या कोई गलत कमांड दे दी, तो कंप्यूटर खराब हो जाए, तो इसमें कम्प्यूटर की गलती है या बेड सेक्टर, या वायरस फाईल डाउनलोड करने वाले की? जवाब सीधा सा है डाउनलोड करने वाले की गलती होगी, कंप्यूटर की नही...

समस्त ज्योतिषियों और दूसरी विधाओं के जानकारों से निवेदन निवेदन कर देना चाहता हूं, कि अगर आपकी खूद की गलती की वजह से अगर कोई भविष्यवाणी गलत सिद्घ होती है, किसी विधा में आप असफल होते हैं, तो आप इसे अहं का कारण न बनाएं और अपनी गलती स्वीकार करें, केवल आपके अहम के कारण के कारण आपकी विधा पर प्रश्न चिह्नï लगता है।

लेख माला की अगली कड़ी में हम पड़ताल करेंगे इस बात की कि भारत का अतीत गौरव शाली रहा है, हमने ज्ञान के क्षेत्र में डंका बजाया था, पिर भी वर्तमान में ज्योतिष विज्ञान के वैज्ञानिक होते हुए भी, प्राय: क्यों सटिक भविष्यवाणियां नहीं हो पाती हैंऔर कमोबेश यही हालत भारत की पुरातन सभी विधाओं की है...
जरूर पड़ें लेखमाला की अगली कड़ी
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

Sunday, September 27, 2009

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं

दशहरा की आप सबको शुभकामनाएं।
बड़े आगे हर क्षेत्र में, चूमे आसमां
आपकी हर शुभ हो विजय
विजयादशमी पर है ये कामनाएं....

पंकज व्यास, रतलाम

Thursday, September 24, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1

चेतावनी-टिप्पणी देने की जल्दबाजी मे न पढ़े, इस लेख माला को शांत दिमाग से पढ़े। समय निकाल कर पढ़ें।

  • बात प्रवीन जाखड जी की.....
पंकज व्यास रतलाम
22 सितंबर को ब्लॉगवाणी को देखा कि अनायास एक हेडिंग पर नजर गई। हेडिंग थी संगीतापुरी जी को दंडवत् प्रणाम! पहले तो लगा जैसे नवरात्रि चल रही है, तो ये ब्लॉगर बंधु संगीतापुरी जी में देवी का अंश देख प्रणाम कर रहे हैं। लेकिन, हेडिंग पर चटका लगाया, टिप्पणियों पर नजर गई तो समझ में आ गया कि माजरा कुछ ओर है। सही कौन है, गलत कौन है? इस बात की चर्चा करना मेरा मकसद नहीं है और न कभी रहेगा। मेरा उद्देश्य यही नहीं रहेगा कि सही कौन है, मेरा लक्ष्य है सही क्या है?

जी हां, सही क्या है? हम बात करें प्रवीण जाखड़ जी की तो ये प्रतिक है उनके, जो धर्म में व्याप्त कुरीतियों, सड़ी गली मान्यताओं, कुप्रथाओं को से नफरत करते हैं, उनसे खीझ गएँ है। कोई इन्हें मुर्ख समझने की भूल करें, तो उसकी सबसे बड़ी भूल होगी।

प्रवीण जाखड़ उन लोगों में उन लोगों में शुमार है, जो भारतीय धर्म, संस्कृति और उसके वांगमय का सम्मान करते हैं उनसे प्रेम करते हैं, किसी आडंबर को नहीं मानते, ये वो हैं जिन्हें पोगापंथ और दकियानुसीता से चिढ़ है।
बकौल प्रवीण जाखड़, 'मैं ज्योतिष का सम्मान करने में पीछे नहीं हट रहा शशांक भाई, लेकिन बाइक का पेट्रोल खत्म हो गया, यानी ग्रह खराब थे। कार का टायर पंक्चर हो गया, ग्रह खराब था। भारत ने चीन बॉर्डर पर सेना भेज दी क्योंकि ग्रह खराब थे। एटीएम से पैसा नहीं निकला क्योंकि ग्रह खराब थे। अब आप हर बात पर ज्योतिष की तुकबंदी मारेंगे, तो किसके पचेगी।

आगे प्रवीन जाखड जी कमेन्ट में लिखते है की मैं सौ फीसदी स्वीकार करता हंू कि ज्योतिष बहुत बड़ा विज्ञान है। गणितीय है। गणितीय है इसीलिए सफल है। लेकिन मैं किसी भी तुकबंदी का पक्षधर नहीं हंू। इस मामले का संदर्भ ज्योतिष के सम्मान या अपमान से जुड़ा हुआ नहीं, अंधेरे में तीर चलाने से ज्यादा है।Ó
प्रवीन जाखड जैसे लोगों का नजरिया हर क्षेत्र में एसा ही रहता है।

प्रवीण जाखड़ जैसे लोग, किसी की बात यूं ही नहीं मान लेते। उन्हें तर्क चाहिए। इस बात का सबूत है उनकी यह कमंट: विप्ल्व साहब, मैं तो सिर्फ तारकिक बहस क ी ओर ले जाने क ी क ोशिश क र रहा था मुद्दे क ो, क्या क रूं मुद्दे हैं क ि ग्रह नक्षत्रों में उलझ जाते हैं। मुद्दों क ी उलझन से शायद मेरा पुराना नाता है।

दरअसल, प्रवीण जाखड़ जैसे लोग क िसी बात क ो आंख बंद क रक े स्वीक ार नहीं क रते। वे अंध श्रृद्घा नहीं रखते, ये सत्य क े साधक हैं, ये सत्य को खोजना चाहते हैं। धर्म को आडंबरों ये लोग धर्म क ो मुक्त कर देना चाहते हैं।

प्रवीण जाखड़ खोजी हैं। बक ौल प्रवीण जाखड़- खोजी पत्रक ारिता और खुलासे क रना मेरा पहला शौक है।
उन लोगों क े प्रतीक है जो क ुछ खोजना चाहते हैं, चाहे वह अध्यात्म ही क्यों न हो? ये हर क्षेत्र में खोजी नजरिया अपनाते है....ये अध्यात्म क ो पाना चाहते हैं, अध्यात्म क े लिए प्यासे हैं। ये भी हिन्दू धर्म क े शुभ चिंतक हैं। और मेरा यक ीं क रें ऐसे लोग ही हिन्दू धर्म क े अध्यात्म क ा प्रक ाश चहुं और फैलायेंगे


प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...2
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  • बात संगीता पुरी जी की .