तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका
आज ज्योतिष और ज्योतिषियों के हाल किसी से छूपे नहीं हैं, ज्योतिष की सही एवं सटिक भविष्यवाणी यदा-कदा ही देखने को मिलती है। कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास मानते हैं, इसका कारण तथाकथित ज्योतिषों द्वारा ठगा जाना रहा है और इसी कारण वे सवाल उठाते हैं। ज्योतिषी उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाते हैं। स्पष्टï है ज्योतिष के जानकारों की कमी है और तथाकथित लोगों को ठगने वाले ज्योतिषयों की भरमार। ज्योतिष की यह दशा क्यों हुई? ज्योतिष की सही व सटिक भविष्यवाणियां अब क्योंं नहीं हो पाती? ऐसे ही सवालों को जानने का जतन करेेंगे हम।
सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि ज्योतिषी कोई भगवान नहीं होता है। असल में होता क्या है कि जब हमारे जेहन में ज्योतिष की तस्वीर उभरती है, तो हमारी आशाएं बढ़ जाती है, हममें अपने व हर क्षेत्र के भविष्य को जानने की उत्कंठा जाग्रत हो जाती है। यही कारण है कि जब ज्योतिष का जिक्र होता है, तो हम ज्योतिषी से कई अपेक्षा लगा बैठते हैं और जाहिर कि वह सर्वज्ञ नहीं होता है, इसलिए हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है। हर एक की सीमा होती है और यही बात ज्योतिष पर भी लागू होती है। हमें उन सीमाओं को समझते हुए ज्योतिष को देखना होगा।
ज्योतिष के आज के हालातों को जानने के लिए हमें पुरातन युग में जाना होगा। उस युग में जिसने कई ज्योतिर्विद हमें दिए। उस वक्त की तस्वीर अपनी आंखों के सामने लाईए, जब विज्ञान नहीं था, लेकिन ज्योतिर्विदों ने यह बता दिया था कि ग्रह नौ होते हैं नव गृह।
ज्योतिष का जन्म जिज्ञासा का परिणाम है। हमें अपने भविष्य को जानने की जिज्ञासा जगी, हमें इस संसार, ब्रह्मïांडको जानने की जिज्ञासा जगी। उसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ऋषि-मुनि ध्यान की गहराईयों में गए, अपने सूक्ष्म शरीर को पार्थिव शरीर से जूदा कर ब्रह्मïांड में विचरण किया और इस तरह उन्हें पता चला कि ग्रह नौ होते हैं। और यही से होती है जोयोतिश कि शुरुआत...
हमें यह समझना होगा कि पुरातन युग में जो ज्योर्तिर्विद सटिक भविष्यवाणी करने के लिए ख्यात होते थे, वे ध्यान, योग विधा में माहिर हुआ करते थे। यहां मैं एक निवेदन करना चाहता हूं कि सटिक भविष्यवाणी के लिए केवल ज्योतिष का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसके लिए योग, ध्यान, आभास , छठी इंद्रिय का सक्रिय होना आदि भी हो तो सोने पे सुहागा। कई चीजों का एक साथ अध्ययन करके सटिक भविष्यवाणी की जा सकती है।
आज के ज्योतिष की गत और उसके हालातों को जानने के लिए हमें प्रसिद्घ पुरातन ज्योतिषियों की पृष्ठïभूमि में जाना होगा। हमें पुरातन व्यवस्था को समझना होगा। चलिए पुरातन युग में...
उस युग में राज्य बाकायदा ज्योतिष जैसी विधा को सम्मान की नजर से देखता था और जो कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधा को समर्पित होना चाहता या पता चलता कि अला व्यक्ति में या फलां व्यक्ति में संभावना है, तो उसे सम्मान तो देता ही, साथ ही उसे जीविकोपार्जन की व्यवस्था से मुक्त करता। याने उसके जीवन की आवश्यक व्यवस्था राज्य करता था और अध्ययन की व्यवस्था करता। उस वक्त ज्योतिष के लिए वातावरण था।
अब गुरु से ज्ञान प्राप्त कर जब विद्वान व्यक्ति समाज में जाता, तो उसकी विद्वता का प्रतिसाद मिलता और राजा, महाराजा, मुखिया उसे सम्मान देते। वह निश्चिंतता से भविष्यवाणी कर सकता था। ज्योतिषी को रोजीरोटी की चिंता नहीं होती थी, उसका एकमात्र काम मनोयोग से ज्योतिर्विज्ञान की सेवा करना, शोध करना आदि होता था। जब रोजी रोटी की चिंता नहीं, तो फिर ज्योतिष की सेवा, शोध और सटिक भविष्यवाणी तो होगी ही। धीरे धीरे यहाँ व्यवस्था खत्म होती चली गई उसका प्रभाव ज्योतिष जैसी विधाओं पर भी पड़ा....
अब बात करें आज के परिदृश्य की तो आज क्या हालात हैं, सबको मालूम है। राज्य की तरफ से ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को प्रश्रय, आश्रय देने की क्या व्यवस्था हो रही है? सब जानते हैं। इस हकीकत से हर किसी को वाकिफ होना चाहिए कि अगर कोई ज्योतिष जैसे विषय का अध्ययन करना चाहे, तो उसे अध्ययन के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। उसे शोध के लिए माहौल देना तो दूर, सुविधाएं देना तो दूर जाने अनजाने में हम उसकी राह में रोड़ा बन जाते हैं। उसके सामने रोजी रोटी की समस्या होती है, जो उसे ज्योतिष के अध्ययन के वक्त विचलित करती है, यह यह समस्या विचलित तो करेगी ही।
एक पहलू यह भी है कि शोध करने वाले ज्योतिषी जब शोध करते हैं और कोई भविष्यवाणी करते हैं और यदि वह गलत निकल जाती है, तो व उसे अपने अहम् का विषय बना लेते हैं और किसी न किसी तरिके से अपने आपको सही ठहराने की तरकिबे भिड़ाते हैं और उसी में वे उलझ कर रह जाते हैं।
ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि यदि कोई भविष्यवाणी गलत सिद्घ होती है, तो आप उसे स्वीकार करें और मानें कि आप से गलती हुई है। निवेदन यह भी कर देना चाहता हूं कि आप शोध के दौरान अपनी भविष्यवाणियों को इस रूप में भी पेश कर सकते हैं कि मैंने भविष्यवाणी की है, शोध जारी है, भविष्यवाणी कितनी सफल होती है, भविष्य पर निर्भर करेगा, आप देखिए कि मेंरी भविष्यवाणी सफल होती है या नहीं?
तमाम ज्योतिष के शोधार्थियों से, जानकारों से निवेदन और उन लोगों से भी निवेदन जो सवाल करते हैं कि शोध जब होता है, तो उसमें कई बार सफलता मिलती है, तो कई बार असफलता का मुंह भी देखना पड़ता है। इसका मतलब शोध में कमी रही है।कमियों को दूर किया जाए,शोध को आगे बढ़ाया जाए।
जो ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी विधाओं के लिए सम्मान भी उनमें बरकरा है, उन तमाम लोगों के बहाने सबसे सवाल करना चाहता हूं कि उदाहरण के लिए कोई ऊर्दू सीखना चाहे, अंग्रेजी सीखना चाहे, कुरान पढऩा चाहे, बाईबिल पढऩा चाहे, तो उसे पर्याप्त मार्गदर्शन व व्यवस्था करने वाले मौजूद हैं, पूरी की पूरी व्यवस्था है, जो प्रोत्साहन देती है, लेकिन कोई किसी भारतीय विधा का सांगोपांग अध्ययन करना चाहे, तो उसके लिए क्यों कोई व्यवस्था नहीं? क्यों? ज्योतिष तो दूर कोई केवल एक भाषा, संस्कृत सीखना चाहे, तो उसके लिए क्या व्यवस्था आसानी से हो जाती है? एक तरफ तो व्यवस्था नहीं, दूसरी तरफ रोजी-रोटी की समस्या मुंह बाएं खड़ी रहती है, तो फिर नि:स्वार्थ भाव से ज्योतिष जैसी विधाओं की सेवा कैसे होगी?
ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कि वे अपने शोध को शोध के रूप में पेश करें, बजाय दावे करने के। वे खूद समझें कि केवल ज्योतिष से काम चलने वाला नहीं है, भविष्यवाणी के लिए आभास, छठि इंद्रीय, ध्यान, योग आदि की आवश्यकता होती है। वे इस बात को समझने की कोशिश करें कि यह वह पुरातन युग नहीं है, जिसे भारतीय विधाओं का स्वर्णीम युग कहा जा सकता है। इस युग के हिसाब से हमें चलना होगा और बजाए भविष्यवाणियों के नाम पर दावे करने के, हमें भविष्यवाणी को शोध के रूप में पेश करना होगा और यदि शोध गलत होता है, तो उसे मानना होगा और सुधार करना होगा।
एक निवेदन ज्योतिर्विज्ञान पर सवाल उठाने वालों से कि केवल सवाल उठाने से काम नहीं चलने वाला है। जिस ज्योतिष जैसी विधा से आप प्रेम करते हैं, सम्मान देेते हैं, उसके लिए आपने वातावरण बनाने के लिए क्या किया, इस पर भी विचार करना होगा।
मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हंू ज्योतिष जैसी विधाओं पर प्रश्न करने वालों से कि आप भारतीय विधाओं पर गर्व तो करते हैं, लेकिन क्या गर्व करने भर से काम चल जाएगा? क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि हम झूठे-पाखंडी ज्योतिषियों को तो बेनकाब करें ही, साथ ही ज्योतिषियों के शोधार्थियों के लिए, जो वास्तव में ज्योतिष जैसी विधाओं ·ो समर्पित हो जाना चाहते हैं, को प्रोत्साहन दें।
मैं समाज के प्रबुद्घवर्ग से, सामाजिक कार्यकर्ताओं से, बुद्घिजीवियों, धर्म-संस्कृति कि बात करने वालो से सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं कि क्यों हम ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना नहीं करते, जिसमें कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को कोई समर्पित होना चाहे, शोध करना चाहे, तो उसके लिए सारी व्यवस्था हो। क्यों न हम उसे रोजी रोटी की समस्या से मुक्त करें, जिससे वह निस्वार्थ भाव से पूरे मनोयोग से ज्योतिष जैसी विधाओं पर शोध कर सके, उन्हें नए आयाम दे सके, उनकी सेवा कर सके, और समाज को लाभान्वित कर सके, क्या ऐसी व्यवस्था नहीं होना चाहिए?? जब वह रोजी-रोटी की समस्या से मुक्त होगा, तो ज्योतिष के नाम पर ठगने की समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।
मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाने वालों से कि आप क्या सवाल ही उठाते रहेंगे या कुछ करेंगे भी? कुछ न सही तो ज्योतिष जैसी विधाओं के लिए वाताववरण ही बनाइए, जिसमें ये विधाएं पुष्पित, पल्लवित हो और इनकी खूशबू चहुंओर फैले। क्यों न ऐसा वातावरण बनाएं?
अंततोगत्वा ज्योतिष पर सवाल उठाने वालों और ज्योतिर्विदों दोनों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि वे अपनी भूमिका पर विचार कर सकते हैं तो करें और बेहतर होगा ज्योतिष जैसी विधा के लिए कि वे अपनी भूमिका बदलें।
अन्यथा तो यूं ही सवाल उठते रहेंगे, और यूं ही चलता रहेगा। नतीजा वही ढाक के तीन पात। शून्य बटा सन्नाटा। आप ही बताईए यही स्थिति रही तो कैसे होगी, सटिक व सही भविष्यवाणी?
>>पंकज व्यास, रतलाम





