Sunday, January 3, 2016

पठानकोट हमला: सेना व सरकार को मोरल सपोर्ट दो


पंकज व्यास, इंदौर/रतलाम
पठानकोट हमले के वक्त देश भर में सरकार की पाक के लिए नीतियों की समीक्षाएं हो रही है . भारत पाक पोलटिक्स पर जमकर कर आलोचनाएँ-समीक्षाएं हो रही है. अब जबकि देश के जवान शहीद हो रहे हो, आतंकवादियों से दो-दो हाथ कर रहे हो, हमें समीक्षा, आलोचनाएँ करने की बजाय सेना व सरकार का मनोबल बढ़ाना चाहिए। समीक्षाएं, आलोचनाएँ बाद में भी हो सकती है.

आप किसी भी राजनीतिक दल, धर्म-मजहब, या विचारधारा से ताल्लुकात रखते हो, उन सब से बढ़कर देश हित की बात होना चाहिए। आपकी देशभक्ति पर सवालिया निशान लगाना मेरा मकसद नहीं, लेकिन उस वक्त जबकि देश के जाबाज योद्धा आतंकियों को अपना पराक्रम दिखा रहे हो, अपना लहू बहा रहे हो, हम इस बात का ध्यान तो रख ही सकते है कि हमारी समीक्षाएं, टिप्पणियाँ, सोशल मीडिया एक्टिविटी सरकार व सेना का मनोबल बढ़ने वाली हो, सेना व सरकार का हौसला बढ़ाने वाली हो. मैदान में हौसले का रोल महत्वपूर्ण होता है. कम से कम हम सेना व सरकार को मोरल सपोर्ट तो दे ही सकते है. मैं आप से इस वक्त ये कहना पसन्द करूँगा कि -
भारत हित चिंतन हो,
मातृ भूमि का वंदन हो,
और लहू बहाते जो
उन वीर शहीदों का अभिनन्दन हो.

Friday, August 26, 2011

पायलट अन्ना और 125 करोड़ की खुशी

एक बार कपिल सिब्बल, चिदंबरम और दिग्विजय सिंह एक साथ हेलिकॉप्टर में जा रहे थे। सिब्बल ने एक 100 रुपये का नोट गिराया और कहा कि मैंने आज एक गरीब भारतीय को खुश कर दिया। तभी दिग्विजय सिंह ने 100 रुपये के 2 नोट गिराए और कहा, मैंने तो 2 गरीब भारतीयों को खुश कर दिया। अब चिदंबरम की बारी थी। उन्होंने एक रुपये के 100 सिक्के गिराए और कहा, मैंने 100 गरीब भारतीयों को खुश कर दिया। उनकी ये बातें सुनकर पायलट हंसा और कहा, अब मैं तुम तीनों को गिराने जा रहा हू, 125 करोड़ भारतीयों को खुशी मिलेगी। पायलट अन्ना हजारे थे। 
साभार: http://navbharattimes.indiatimes.com/
 
 

Sunday, August 14, 2011

ये कैसी आजादी

ये कैसी आजादी


पंकज व्यास
चाहे लोकपाल बिल हो, या काला धन भारत में लाने की मांग, इस आजाद (?)देश में विरोध के लिए भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। अन्ना हजारे से लेकर बाबाराम देव तक जो घटनाक्रम चला, व चल रहा है, उससे यह सवाल सहज ही उठ जाता है कि क्या आजादी का पंछी बेबश है? उसकी आंखों में बेबसी साफ नजर आ जाती है। स्वतंत्र भारत में आजादी के पंछी को घुटन महसूस हो रही है। गुलामी की जंजीरें तोड़ तो दी गई हंै, पिंजरे को खेल तो दिया है, लेकिन लगता है कई पहरूएं बिठा दिए गए है। वो सोच रहा है ये कैसी आजादी?
बीते बरस जब हम १५ अगस्त मना रहे थे, तब तक कश्मीर जल रहा था, अलगाववाद की लपटें उठ रहीं थीं, राज्यों में नक्सलवाद हाहाकार मचा रहा था, महाराष्ट्र में भाषायी आतंकवाद जब-तब खड़ा हो रहा था, तो हर ओर जातिवाद गहराता जा रहा था, तब कहीं कोई ऐसा व्यक्तित्व नजर नहीं आ रहा था, जिसकी एक आवाज पर देशवासी जातपात, धर्म-प्रांत, भाषा, अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण के भेद को भुलाकर खड़े हो जाए। लेकिन, इस स्वतंत्रता दिवस तक आते-आते परिदृश्य बदल चुका है। स्वतंत्र भारत केआसमान पर दो सितारे ऐसे उभरे हैं, जिनकी आवाज पर लोग सारे भेदभाव भूलाकर खड़े होने को तैयार दिखते हैं।
लोकपाल के लिए अन्ना हजारे द्वारा किए गए अनशन को जन-जन का जिस तरह से समर्थन मिला, कालेधन को भारत में लाने की मांग को लेकर किए गए बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन में जिस तरह से लोगों की भागीदारी देखने को मिली, उसने यह साबित कर दिया कि इन दोनों की आवाज पर लोग मुद्दे की बात पर, साफ-सुथरे नेतृत्व के साथ देशहित के लिए एक हो सकते हैं, एक साथ खड़े हो सकते हैं।
लेकिन, बाबा रामदेव द्वारा चलाए गए सत्याग्रह के दौरान आंदोलनकारियों के साथ जिस तरह से अमानवीय कार्रवाई की गई, जिस तरह से अन्ना हजार को उलझा कर रख दिया गया, उससे आजादी का पंछी कहीं न कहीं बेबश नजर आता है। लगता है आजादी पर कई पहरूएं बिठा दिए गए हैं, सिद्धांत रूप में तो सिखचें खोल दिए गए हैं, लेकिन यथार्थ में आज भी वह बेबश है, उसे घुटन हो रही है।
मुद्दा बाबा रामदेव के सत्याग्र्रह आंदोलन, अन्ना हजारे के अनशन की प्रासंगिकता का नहीं है, मुद्दा है इस स्वतंत्र भारत में जनहित के लिए विरोध पर लगी अप्रत्यक्ष बंदिशों का है। सारा घटनाक्रम यह साबित करता है कि अगर तंत्र का विरोध किया, तो उलझ कर रह जाओंगे।
सबसे बड़ी बात तो ये हैं कि अन्ना हजारे या बाबा रामदेव खुद के लिए आंदोलन तो नहीं कर रहे हैं, वे अगर एक मजबूत लोकपाल बिल चाहते हैं, वे अगर विदेशों में जमा कालेधन को भारत में लाने की मां” कर रहे हैं, तो क्या गलत कर रहे हैं।
दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे घटनाक्रम में सरकारों की सामंतवादी सोच जाहिर हुई है, जो अपने खिलाफ उठने वाली किसी आवाज को पसंद नहीं करती है। ये इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां स्वार्थ की राजनीति के लिए, दिखावटी विरोध तो आसानी से किए जा सकते हैं, लेकिन जो मुद्दे की बात करते हैं, बड़ी शिद्दत के साथ जनहित से जुड़े होते हैं, उन्हें राजनीति में उलझाकर रख दिया जाता है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे उसी सामंतवादी सोच और कुत्सित राजनीति के शिकार हो रहे हैं, जिसमें अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबा दिया जाता है।
लेकिन, इतना सब होते हुए भी उम्मीद की रोशनी नजर आती है, पिछले स्वतंत्रता दिवस तक जहां देश में कोई ऐसा नेतृत्व नजर नहीं आ रहा था, जिसकी आवाज पर देशवासी एक हो जाए, वहीं इस आजादी के पर्व पर हमें एक नहीं दो-दो सितारे स्वतंत्र भारत के आसमान पर नजर आ रहे हैं, जिनकी आवाज पर देशवासी हर प्रकार का भेदभाव भुलाकर एकता के सूत्र में बंधने को तैयार नजर आ रहे हैं।

Tuesday, August 2, 2011

हमारा रतलाम ब्लॉग पंकज व्यास का नहीं

काफी दिनों के बाद चिट्ठाजगत में सक्रिय होने जा रहा हूँ. समय की कमी रही. मन-मानस के लियें इस दूरी का भी एक अलग अनुभव रहा.  

इस दौरान समाज में, विशेषकर रतलाम में, किन्ही कारणों से यह सन्देश गया- हमारा रतलाम ब्लॉग पंकज व्यास का है. इस पोस्ट के माध्यम से मै सबको सूचित कर देना चाहता हूँ- हमारा रतलाम ब्लॉग मेरा याने, पंकज व्यास का नहीं है. 

Saturday, July 30, 2011

हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है.......

मैंने वक्त बदलते देखा है,
दुनिया के दस्तूर बदलते देखे हैं,
मैंने, मैंने, रिश्ते और रिश्तेदार बदलते देखे हैं
मैंने, अपनो को बैगाना होते देखा है,
हाँ, हाँ,  मैंने वक्त बदलते देखा है......

Wednesday, September 1, 2010

क्या मतलब ऐसे चिरकट पौधा रोपण का ?

 क्या मतलब ऐसे चिरकट पौधा रोपण का ?
-पंकज व्यास, रतलाम
एक दिन एक पौधा आकर मुझसे बोला-भई लिख्खाड़ मेरे तो करम ही फूटे हैं। मैंने पूछा- क्यों, क्या हो गया? वो बोला- जिसे देखो वो मुझे रोंपने चला है। मैंने कहा- तेरक तो खुश होना चाहिए, लोग तुझे रोंप रहे हैं, तू ही आगे जाकर वृक्ष बनेगा और पर्यावरण पोषण में सहायक बनेगा।  वो बोला- खाक वृक्ष बनेगा। मैं पौधा एक, ...और रोंपने वाले 10-10। सब मिलकर मुझक रोपते हैं, फोटो खिंचवाने के  लिए। दस-दस हाथ मेरी मुंडी पकड़ते हैं।  पौधा रोपण क पहले ही अनजाने में कचुमर बनाने में कई कसर नहीं छोड़ते हैं। बाद में ध्यान नही देते। अब भला मैं कसे विकस करूंगा और बताओ कसे वृक्ष बनुंगा।