Wednesday, February 17, 2010

व्यंग्य / जय रतलाम कि हाय रतलाम....

पंकज व्यास,रतलाम
आजकल मैं बड़ी खुशफहमी में जी रहा है। बड़ा खुश हूं, अचानक मुझे लगने लगा है कि रतलाम का विकास होने लगा है। रतलाम विकास कर रहा है। ऐसा लगता है जैसे रतलाम विकास के चौक्के-छक्के जड़ कर मानेगा। मैं बड़े सुनहरे स्वप्न में डूबा हुआ हूं। रह-रह कर मुझे रतलाम की जय-जयकार सुनाई दे रही है। जय रतलाम की गुंज कानों में गुंज रही है। शहर में लगे रतलाम की  जय-जयकार करते होर्डिंग मेंरा सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं। मुझे अपने रतलाम पर बड़ा अभिमान हो रहा है। शहर में हर दूसरा-तीसरा व्यक्ति  रतलाम की जय-जयकार करता दिखता है, तो मैं रतलाम के सुनहरे भविष्य में डूब जाता हूं...

 

एक विकसित, हर मामले में आगे रतलाम के ख्वाब में डूबा, मदहोश मैं चला जा रहा हूं। मैं बड़े रूमानी माहौल में हूं। मुझे सब कुछ अच्छा-अच्छा लगा रहा है... मैं रतलाम की सड़कों पर चला जा रहा हूं... कि तभी मुझे ठोकर लगती है और मैं गिर जाता हूं। दर्द से कराहता हूं कि तभी एक पत्थर ठहठहा कर हंसता है। यह वही पत्थर है, जिसके कारण मैंने ठोकर खाई और मैं गिरा और चोंट लगी।
मैंने कराहते हुए उससे पूछा- क्यों हंसता हैं मुझ पर? पत्थर कुछ बोलता उससे पहले ही सड़क के गड्डे से एक बच्चे टाईप पत्थर उछलता हुआ आता है और अदनी से हंसी हंस कर कहता है, ठोकर तो लगेगी ही, हम पत्थर उभरते रहेंगे और तुम चिकनी सड़क नहीं बनाओंगे तो ठोकर तो लगेगी ही... मैं पत्थर को डाटता-डपटता उससे पहले ही हवा का एक झोंका आया और सुहाने से मौसम में बदबू फैला गया। मैंने कहा हवा से- क्यों री बदबू क्यों फैला रही है? हवा कुछ कहती उससे पहले ही पास में पड़ा कचरे का ढेर टूकर-टूकर, घूर-घूर कर मुझे देखने लगा। तभी कचरे के ढेर से एक कुड़ा उचक कर आ गया और उपहासपूर्ण तरीके से मुझे बोला हाय रतलाम... हाय रतलाम... मैंने कहा- बोल, जय रतलाम, जय रतलाम, जय-जय रतलाम...
मैं आसमान की तरफ निहारने लगा कि तभी स्ट्रीट लाईट का टूटा-फूटा, बंद पड़ा लेम्प खिसियानी हंसी हंसने लगा और उसने भी आंखे बड़ी की मुह खोला और फट से बोला- हाय रतलाम... मैंने आंखे तरेरी और बोला- बोला जय रतलाम, जय-जय रतलाम...
पास ही गंदगी से, कुड़ा करकट से जाम पड़े नाले ने भी उनके सूर में सूर मिलाया और बोले हाय रतलाम... वे सब एक साथ हाय रतलाम के नारे लगा रहे हैं .... मैं उनको  देखना नहीं चाहता, सुनना नहीं चाहता इसलिए मैंने आंख बंद कर ली, कान में ऊंगली ठूस ली और रतलाम के विकास का स्वप्न देखने लगा...और जय-जय रतलाम  के नारे लगाने लगा....
बंधुओं, मैं रतलाम के विकास का स्वप्न देखना चाहता हूं। रतलाम के स्वर्णिम भविष्य में डूब जाना चाहता हूं। जय रतलाम नहीं, जय-जय रतलाम की प्रतिध्वनि से आसमान को गुंजायमान कर देना चाहता हूं।  रंगीन भविष्य की रंगीनियत और रूमानियत मुझे आकर्षित करती है, लेकिन क्या करूं वर्तमान में हो रहे  कमबख्त सड़क के गड्ढे, उबड़-खाबड़ सड़क, कहीं सड़क की कमी, अनचाहे बदबू मारते कचरे के ढेर, रातों को भयावह करते बंद पड़े स्ट्रीट लाईट के लेम्प ये सब रह-रह  कर हाय रतलाम, हाय रतलाम के नारे लगा रहे हैं, मुझे ताने मार रहे हैं...

ये मेरे चित्त को विचलित कर रहे हैं, मुझे रतलाम के विकास का स्वप्न नहीं देखने दे रहे हैं...ये मुझे परेशान कर रहे हैं..., मैं इन सबके खिलाफ शिकायत करना चाहता हूं... ये कचरे के ढेर, बंद पड़े स्टीट लाईट के लेम्प, जाम पड़े नाले, मुझे मानसिक पीड़ा दे रहे हैं, अपने रतलाम को नीचा दिखा रहे हैं, सरे आम हाय रतलाम के नारे लगाकर अपमानित कर रहे हैं, मैं इनके खिलाफ जनसुनवाई करवाना चाहता हूं..., इनके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाना चाहता हूं... आप बताईए ना.. कहां करवाऊं जनसुनवाई, कहां लिखवाऊ रिपोर्ट...? हाय रतलाम और जय-जय रतलाम के नारों के बीच हाय रतलाम को दबा देना चाहता हूं, इनकी बोलती बंद कर देना चाहता हूं, पर ये कुछ ज्यादा ही उछल रहे हैं और हाय रतलाम के नारे बढ़ चढ़ के लगा रहे हैं... इनका कुछ करो यार...इनकी बोलती बंद करो यार...

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जय रतलाम!
सुन्दर पोस्ट!

Maria Mcclain said...

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