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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3
एक तरफ संगीतापुरी जैसे लोग हैं, जो भारतीय विधाओं जैसे ज्योतिष आदि के मूल तत्व को जानना चाहते हैं, समर्पित हो जाना चाहते हैं और तमाम आडंबरों व दकियानुसीता को दूर फटकारते हुए ज्योतिष जैसी विधा को जन जन तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, तो दूसरी तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग हैं, जो ज्योतिष आदि भारतीय विधाओं पर गर्व करते हैं और यकिन भी करते हैं, लेकिन ज्योतिष के नाम पर चल रही दुकानदारी से उन्हें घीन है, जो ज्योतिष के नाम पर हो रही अंधश्रृद्घा और आडम्बर से नफ़रत करते है और इसीलिए जहां कहीं कुछ कमी हो जाती है, ये अपनी कलम के माध्यम से वार करने को बेताब नजर आते हैं, इन्हें तथ्य चाहिए होते हैं और जब इन्हें नहीं मिलते हैं तो ऐसे लोग खुला चेलेंज देते हैं और करते हंै सवालों की बौछार, जब इनको जवाब नहीं मिलता है, तो मुमकिन है कि ज्योतिष से इनकी आस्था धीरे-धीरे कम भी होती जाती है। एक तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जो आडंबरों के धूर विरोधी, तो दूसरी तरफ संगीतापुरी जैसे लोग जिन्हें पुरातन विधाओं के मूल को सहजने और उसकी निरंतरता स्थापित करने में गहरी दिलचस्पी है, मगर इन दोनों व्यक्तित्वों के बीच ऐसे लोग भी हंै, जिन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं है, जो अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए ज्योतिष के नाम पर दुकानदारी चलाते हैं और सामने वाले को मुर्गा मान उसे फंसाने से पीछे नहीं हटते। असल में ये ही लोग होते हैं, जिनके कारण भारतीय विधाएं और ज्योतिष बदनाम हैं।
दरअसल, जब प्रवीण जाखड़ जैसे लोग आडंबरों पर कुठाराघात करते हैं, तो इन लोगों पर तो कोई असर नहीं होता है, वरन संगीतापुरी जैसे लोग निशाने पर आ जाते हैं। तब संगीतापुरी जैसे लोग व्यथित होते हैं, विचलित भी हो सकते हैं। ये व्यथित होते हैं, यही इसका प्रमाण है कि ये आडंबरों के पोषक नहीं, वरन भारतीय विधाओं को स्थापित करने के लिए समर्पित होने वाले लोगों में से हैं, जबकि ज्योतिष के नाम पर मुर्गा मान लोगों को फांसने वालों पर इसका कोई असर नहीं होता है।
प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जब आडंबरों और कुरीतियों से पर लेखनी के माध्यम से कुठाराघात करते हैं, सवाल उठाते हैं, तो संगीतापुरी जैसे लोग जो अनुसंधान में लगे हैं, व्यथित हो जाते हैं, विचलित हो जाते हैं, उनकी तन्मयता भंग हो जाती है और फिर ये प्रवीण जाखड़ जैसे लोगों को अपना विरोधी मानने लग जाते हैं। प्रवीण जाखड़ और संगीता पूरी जैसे लोग आपस में लड़ते झगड़ते रह जाते हैं और मजा दूसरे लोग मार जाते हैं और बदनाम ज्योतिष जैसी विधाएं होती रहती है?
अब स्पष्ट हो जाना चाहिए कि एक तरफ आडंबरों के धूर विरोधी हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग जो आडंबरों को दूर तो करना चाहते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं आदि को विश्व पटल से ओझल होते हुए भी नहीं देख सकते हैं और उसके मूल को सबके सामने लाना चाहते हैं। इनके बीच हैं ऐसे लोग जिनके लिए ये सब दुकानदारी है, इनके कारण ज्योतिष जैसी विधाएं बदनाम हो रही है, और फिर ऐसे लोग भी तो हैं, जिनका मकसद ज्योतिष जैसी विधाओं को बदनाम करना ही है। वे ऐसे मौकों को और लोगों को ढूंढते रहते हैं, कि कहां कमी नजर आए और बदनाम करें...
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ ·र गुजरना है ...ये हेडिंग जब आपके सामने से गुजरती होगी आपके जेहन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि इन सबके बीच मुझे क्या कर गुजरना है?
यहां मैं सवाल छोड़ जाता हूं आपके लिए कि आखिर ऐसे क्या कारण रहे हैं, जो ज्योतिष जैसी विधा के जानकारों की कमी होती गई और आडंबरों की भरमार? क्यों होती गई ज्योतिष जैसी विधाओं की उपेक्षा और भारतीय विधाए बदनाम
हम मिलकर करेंगे इसकी चर्चा ...आपकी चाहियें सहभागिता .....
पंकज व्यास रतलाम





