Monday, November 9, 2009

तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका

 (नोट- यह आर्टिकल प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है मुझे तो कुछ गुजरना है..., का ही भाग है, किन्हीं कारणों से हेडिंग को बदला है। इस आर्टिकल में जानबुझकर प्रवीण जाखड़ जी व संगीतापुरीजी के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन इसे आप प्रवीण जाखडज़ी और संगीतापुरीजी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है... लेखमाला के तारतम्य में ही देखें। बाकी बातों की चर्चा लेखमाला की अगले व अंतिम भाग में करेंगे। फिलहाल तो आप इस आर्टिकल को पढ़ें। लेख बड़ा जरूर है, लेकिन   निवेदन यही कि पढ़कर अपना मत जरूर बताएं। धन्यवाद    -पंकज व्यास, रतलाम)
 तो फिर कैसे होगी सही व सटिक भविष्यवाणी, हमें बदलनी होगी भूमिका
आज ज्योतिष और ज्योतिषियों के हाल किसी से छूपे नहीं हैं, ज्योतिष की सही एवं सटिक भविष्यवाणी यदा-कदा ही देखने को मिलती है।  कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास  मानते हैं, इसका कारण तथाकथित ज्योतिषों द्वारा ठगा जाना रहा है और इसी कारण वे सवाल उठाते हैं। ज्योतिषी उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाते हैं। स्पष्टï है ज्योतिष के जानकारों की कमी है और तथाकथित लोगों को ठगने वाले ज्योतिषयों की भरमार। ज्योतिष की यह दशा क्यों हुई? ज्योतिष की सही व सटिक भविष्यवाणियां अब क्योंं नहीं हो पाती?  ऐसे ही सवालों को जानने का जतन करेेंगे हम।



सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि ज्योतिषी कोई भगवान नहीं होता है। असल में होता क्या है कि जब हमारे जेहन में ज्योतिष की तस्वीर उभरती है, तो हमारी आशाएं बढ़ जाती है, हममें अपने व हर क्षेत्र के भविष्य को जानने की उत्कंठा जाग्रत हो जाती है। यही कारण है कि जब ज्योतिष का जिक्र होता है, तो हम ज्योतिषी से कई अपेक्षा लगा बैठते हैं और जाहिर कि वह सर्वज्ञ नहीं होता है, इसलिए हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है। हर एक की सीमा होती है और यही बात ज्योतिष पर भी लागू होती है। हमें उन सीमाओं को समझते हुए ज्योतिष को देखना होगा।

ज्योतिष के आज के हालातों को जानने के लिए हमें पुरातन युग में जाना होगा। उस युग में जिसने कई ज्योतिर्विद हमें दिए। उस वक्त की तस्वीर अपनी आंखों के सामने लाईए, जब विज्ञान नहीं था, लेकिन ज्योतिर्विदों ने यह बता दिया था कि ग्रह नौ होते हैं नव गृह।

ज्योतिष का जन्म जिज्ञासा का परिणाम है। हमें अपने भविष्य को जानने की जिज्ञासा जगी, हमें इस संसार, ब्रह्मïांडको जानने की जिज्ञासा जगी। उसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ऋषि-मुनि ध्यान की गहराईयों में गए, अपने सूक्ष्म शरीर को पार्थिव शरीर से जूदा कर ब्रह्मïांड में विचरण किया और इस तरह उन्हें पता चला कि ग्रह नौ होते हैं। और यही से होती है जोयोतिश कि शुरुआत...

हमें यह समझना होगा कि पुरातन युग में जो ज्योर्तिर्विद सटिक भविष्यवाणी करने के लिए ख्यात होते थे, वे ध्यान, योग विधा में माहिर हुआ करते थे। यहां मैं एक निवेदन करना चाहता हूं कि सटिक भविष्यवाणी के लिए केवल ज्योतिष का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसके लिए योग, ध्यान, आभास , छठी इंद्रिय का सक्रिय होना आदि भी हो तो सोने पे सुहागा। कई चीजों का एक साथ अध्ययन करके सटिक भविष्यवाणी की जा सकती है।

आज के ज्योतिष की गत और उसके हालातों को जानने के लिए हमें प्रसिद्घ पुरातन ज्योतिषियों की पृष्ठïभूमि में जाना होगा। हमें पुरातन व्यवस्था को समझना होगा। चलिए पुरातन युग में...

उस युग में राज्य बाकायदा ज्योतिष जैसी विधा को सम्मान की नजर से देखता था और जो कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधा को समर्पित होना चाहता या पता चलता कि अला व्यक्ति में या फलां व्यक्ति में संभावना है, तो उसे सम्मान तो देता ही, साथ ही उसे जीविकोपार्जन की व्यवस्था से मुक्त करता। याने उसके जीवन की  आवश्यक व्यवस्था राज्य करता था और अध्ययन की व्यवस्था करता। उस वक्त ज्योतिष के लिए वातावरण था।

अब गुरु से ज्ञान प्राप्त कर जब विद्वान व्यक्ति समाज में जाता, तो उसकी विद्वता का प्रतिसाद मिलता और राजा, महाराजा, मुखिया उसे सम्मान देते। वह निश्चिंतता से भविष्यवाणी कर सकता था। ज्योतिषी को रोजीरोटी की चिंता नहीं होती थी, उसका एकमात्र काम मनोयोग से ज्योतिर्विज्ञान की सेवा करना, शोध करना आदि होता था। जब रोजी रोटी की चिंता नहीं, तो फिर ज्योतिष की सेवा, शोध और सटिक भविष्यवाणी तो होगी ही। धीरे धीरे यहाँ व्यवस्था खत्म होती चली गई उसका प्रभाव ज्योतिष जैसी विधाओं पर भी पड़ा....

अब बात करें आज के परिदृश्य की तो आज क्या हालात हैं, सबको मालूम है। राज्य की तरफ से ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को प्रश्रय, आश्रय देने की क्या व्यवस्था हो रही है? सब जानते हैं। इस हकीकत से हर किसी को वाकिफ होना चाहिए कि अगर कोई ज्योतिष जैसे विषय का अध्ययन करना चाहे, तो उसे अध्ययन के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। उसे शोध के लिए माहौल देना तो दूर, सुविधाएं देना तो दूर जाने अनजाने में हम उसकी राह में रोड़ा  बन जाते हैं। उसके सामने रोजी रोटी की समस्या होती है, जो उसे ज्योतिष  के अध्ययन के वक्त विचलित करती है, यह यह समस्या विचलित तो करेगी ही।

एक पहलू यह भी है कि शोध करने वाले ज्योतिषी जब शोध करते हैं और कोई भविष्यवाणी करते हैं और यदि वह गलत निकल जाती है, तो व उसे अपने अहम् का विषय बना लेते हैं और किसी न किसी तरिके से अपने आपको सही ठहराने की तरकिबे भिड़ाते हैं और उसी में वे उलझ कर रह जाते हैं।

ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि यदि कोई भविष्यवाणी गलत सिद्घ होती है, तो आप उसे स्वीकार करें और मानें कि  आप से गलती हुई है। निवेदन यह भी कर देना चाहता हूं कि आप शोध के दौरान अपनी भविष्यवाणियों को इस रूप में भी पेश कर सकते हैं कि  मैंने भविष्यवाणी की है, शोध जारी है, भविष्यवाणी कितनी सफल होती  है, भविष्य पर निर्भर करेगा, आप देखिए कि मेंरी भविष्यवाणी सफल होती है या नहीं?

तमाम ज्योतिष के शोधार्थियों से, जानकारों से निवेदन और उन लोगों से भी निवेदन जो सवाल करते हैं कि शोध जब होता है, तो उसमें कई बार सफलता मिलती है,  तो कई बार असफलता का मुंह भी देखना पड़ता है। इसका मतलब शोध में कमी रही है।कमियों को दूर किया जाए,शोध को आगे बढ़ाया जाए।

जो ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी विधाओं के लिए सम्मान भी उनमें  बरकरा है, उन तमाम लोगों के बहाने सबसे सवाल करना चाहता हूं कि उदाहरण के लिए कोई ऊर्दू सीखना चाहे, अंग्रेजी सीखना चाहे, कुरान पढऩा चाहे, बाईबिल पढऩा चाहे, तो उसे पर्याप्त मार्गदर्शन व व्यवस्था करने वाले मौजूद हैं, पूरी की पूरी व्यवस्था है, जो प्रोत्साहन देती है, लेकिन कोई किसी भारतीय विधा का सांगोपांग अध्ययन करना चाहे, तो उसके लिए क्यों कोई व्यवस्था नहीं? क्यों? ज्योतिष तो दूर कोई केवल एक भाषा, संस्कृत सीखना चाहे, तो उसके लिए क्या व्यवस्था आसानी से हो जाती है? एक तरफ तो व्यवस्था नहीं, दूसरी तरफ रोजी-रोटी की समस्या मुंह बाएं खड़ी रहती है, तो फिर नि:स्वार्थ भाव से ज्योतिष जैसी विधाओं की सेवा कैसे होगी?

ज्योतिष के शोधार्थियों से निवेदन कि  वे अपने शोध को शोध के रूप में पेश करें, बजाय दावे करने के। वे खूद समझें कि केवल ज्योतिष से काम चलने वाला नहीं है, भविष्यवाणी के लिए आभास, छठि इंद्रीय, ध्यान, योग आदि की आवश्यकता होती है। वे इस बात को समझने की कोशिश करें  कि यह वह पुरातन युग नहीं है, जिसे भारतीय विधाओं का स्वर्णीम युग कहा जा सकता है। इस युग के हिसाब से हमें चलना होगा और बजाए भविष्यवाणियों के नाम पर दावे करने के, हमें भविष्यवाणी को शोध के रूप में पेश करना होगा और यदि शोध गलत होता है, तो उसे मानना होगा और सुधार करना होगा।

एक निवेदन ज्योतिर्विज्ञान पर सवाल उठाने वालों से कि केवल सवाल उठाने से काम नहीं चलने वाला है। जिस ज्योतिष जैसी विधा से आप प्रेम करते हैं, सम्मान देेते हैं,  उसके लिए आपने वातावरण बनाने के लिए क्या किया, इस पर भी विचार करना होगा।

मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हंू ज्योतिष जैसी विधाओं पर प्रश्न करने वालों से कि आप भारतीय विधाओं पर गर्व तो करते हैं, लेकिन क्या गर्व करने भर से काम चल जाएगा? क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि हम झूठे-पाखंडी ज्योतिषियों को तो बेनकाब करें ही, साथ ही ज्योतिषियों के शोधार्थियों के लिए, जो वास्तव में ज्योतिष जैसी विधाओं ·ो समर्पित हो जाना चाहते हैं, को प्रोत्साहन दें।

मैं समाज के प्रबुद्घवर्ग से, सामाजिक कार्यकर्ताओं से, बुद्घिजीवियों, धर्म-संस्कृति कि बात करने वालो से सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं कि क्यों हम ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना नहीं करते, जिसमें कोई ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं को कोई समर्पित होना चाहे, शोध करना चाहे, तो उसके लिए सारी व्यवस्था हो। क्यों न हम उसे रोजी रोटी की समस्या से मुक्त करें, जिससे वह निस्वार्थ भाव से पूरे मनोयोग से ज्योतिष जैसी विधाओं  पर शोध कर सके, उन्हें नए आयाम दे सके, उनकी सेवा कर सके, और समाज को लाभान्वित कर सके,  क्या ऐसी व्यवस्था  नहीं होना चाहिए?? जब वह रोजी-रोटी की समस्या से मुक्त होगा, तो ज्योतिष के नाम पर ठगने की समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।

मैं सवाल पूछने का साहस करना चाहता हूं ज्योतिष जैसी विधाओं पर सवाल उठाने वालों से कि आप क्या सवाल ही उठाते रहेंगे या कुछ करेंगे भी? कुछ न सही तो ज्योतिष जैसी  विधाओं के लिए वाताववरण ही बनाइए, जिसमें ये विधाएं पुष्पित, पल्लवित हो और इनकी खूशबू चहुंओर फैले। क्यों न ऐसा वातावरण बनाएं?

अंततोगत्वा ज्योतिष पर सवाल उठाने वालों और ज्योतिर्विदों दोनों से निवेदन कर देना चाहता हूं कि वे अपनी भूमिका पर विचार कर सकते हैं तो करें और बेहतर होगा ज्योतिष जैसी विधा के लिए कि वे अपनी भूमिका बदलें।

अन्यथा तो यूं ही सवाल उठते रहेंगे, और यूं ही चलता रहेगा। नतीजा वही ढाक के तीन पात। शून्य बटा सन्नाटा। आप ही बताईए यही स्थिति रही तो कैसे होगी, सटिक व सही भविष्यवाणी?
>>पंकज व्यास, रतलाम 



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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१

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6 comments:

संगीता पुरी said...

एक सच्‍चे ज्‍योतिषी के दिल की बात लिख दी है आपने .. मेरा तो बस यही मानना है .. इस दुनिया में दो वर्ग हैं .. पहले वर्ग के लोगों का कहना है कि भला करोड़ों मील दूर स्थित ग्रह हमें किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं ..वहीं दूसरे वर्ग के लोगों को आकाशीय पिंड की जानकारी से कोई मतलब ही नहीं .. मतलब अपने भाग्य की जानकारी से है .. इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने अनजाने काफी नुकसान है रहा है .. एक भारतीय प्राचीन विद्या को हमारे देश में उचित स्थान नहीं मिल रहा है .. ज्योतिष के पक्ष और विपक्ष में बहुत सारी बातें हो चुकी हैं .. सबके अपने.अपने तर्क हैं .. इसलिए किसी की जीत या हार हो ही नहीं सकती .. बेहतर होगा कि बुद्धिजीवी वर्ग हर प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर ज्योतिषियों की बात सुनें .. उनपर विचार करें।

अर्शिया said...

दरअसल ज्योतिष को हमारे समाज में कुछ ज्यादा ही ग्लोरीफाई करके प्रस्तुत किया गया है, इसी कारण लोग इसके नाम पर लूट रहे हैं। सबसे पहले यह लूट बंद हो, इसके लिए लोगों को सचेत किया जाना आवश्यक है।
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और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।

arun prakash said...

achha aaina dikhaya hai jyotishi guruvo ko manthan karana chahiye jo trikaalagya bane dukaan laga rakhe hain

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आस्था के आगे वैज्ञानिकता का कोई स्थान नही है।

S B Tamare said...

पंकज व्यास रतलाम वाले के नाम खुला ख़त !
प्रिय पंकज जी,
बड़ा अफ़सोस रहा की आपका ब्लॉग कैसे मेरी नजरो से अछूता रहा, खैर देर आये दुरूस्त आये/
यद्धपि यह देर बड़ी महँगी पड़ रही है मुझे क्योकि जो प्रश्न प्रवीन जाखड जी ने अपने ब्लॉग से संगीता पूरी के बहाने उठाये थे उसका दूसरा सूत्र तो आपने थामा हुआ था और जो मै पढ़ नहीं पाया , खैर अबतो जो होचुका सो हो चुका जाखड जी के सात यक्ष प्रश्नों का मैंने उत्तर लिख दिया था उम्मीद है आपने पढ़ा होगा/
वर्तमान सन्दर्भ में , मै आपके कई बातो से सहमत हूँ और कई से नहीं मसलन मै समझता हूँ की समय चाहे आज का हो या पुराना ज्योतिषी कोई एक दो ही एसे होते थे जिन्हें राजा का आश्रय प्राप्त होता था बांकियो को तब भी धक्के खाने पड़ते थे जो उच्च कोटि के होते थे वो राजाश्रय पाते थे नाकि सभी / संघर्ष पहले भी था आज भी है और संघर्ष ना हो तो सोने को निखारा नहीं जा सकता / संघर्ष के बिना वास्तविक ज्योतिष बिद्या प्रकट ही नहीं हो सकती अतः जिस किसी संगीता पूरी में दम हो वो प्रवीन जाखड जैसे संदेहों का मुहतोड़ जवाब दे या फिर अपने घर बैठे और गोलगोल जवाब दे कर अपने जैसे गोलगोल ब्लोगरो का जी बहलाए / यदि कोई ज्योतिषी लोगो को बेवकूफ बना रहा है तो इसमे ज्योतिषी का कसूर कम और लोगो का कसूर ज्यादा है क्यों कोई आदमी बेकार वस्तु खरीद कर अपने घर लेजाता है क्या प्रभु ने नेत्रा नहीं दिए है जो वस्तु को परख कर खरीद नहीं सकते / मुझे पढ़े लिखे भतेरे डॉक्टर मिले जो आधुनिक अंग्रेजी भाषा बोल कर लोगो से दैत्यों की तरह धन लूट लेते है मै खुद जीवन में चार बार उनका शिकार बन चुका हूँ तो उन पढ़े लिखे आधुनिक विज्ञानिक दृष्टि कोण वालो को कोई कुछ नहीं कहता, हाँ! यह जरूर बाते होती है पीठ पीछे की वो फलना डॉक्टर एकदम डाकू है /
दूसरी बात जिससे मै आपसे इतेफाक नहीं रखता वो यह है की ज्योतिष कोई विज्ञान नहीं है !
ज्योतिष परालौकिक गुयः विद्या है विज्ञान नहीं, इसे स्वयं भगवान सूर्य ने याग्यवाल्या को दिया और फिर अनेक ऋषियों से होता हुआ आज हम तक पहुंचा है / यह विद्या सृष्टी के फंक्शन को ब्यान करती है की वो किस प्रकार कार्य कर रही है यानी कौन सा पिंड किस तेजी से घूम कर क्या घटित कर रहा है , सुक्षम से सूक्षम वस्तु ईस्वर की रचना से ग्रहों के माध्यम से बाहर नहीं है और इस गुय्ह विद्या को विज्ञान जैसी बकवास दृष्टी से नहीं समझा जा सकता , विज्ञान भौतिक पदार्थ का अध्यन करता है वो भौतिक यान भेज कर ग्रह पिंड के दर्शन कर सकता है परन्तु ज्योतिष जिस चतुर्भुज कमलासन विराजमान एक पहिये वाले रथ पर सवार सूर्य देव को बयान करता आ रहा है उसे विज्ञान नहीं देख सकता जो सृष्टी के आधार है / गणितीय सांख्यकी तो गणना को साधे रखने के लिए ज्योतिष की बाहरी भेष भूषा है उसके बहकावे में उसे विज्ञान मान्लेने की भूल ना करे, ज्योतिष को किसी अनुसंधान की भी जरूरत नहीं है क्योकि यही एक मात्र वह विद्या है जिसे किसी अनुसन्धान की जरूरत नहीं बल्कि उस बन्दे की जरूरत है जो एस सूक्षम विद्या को ''धारण'' करने की योग्यता रखता हो यानी यह विद्या जब सूर्य देव ने याज्ञवल्य ऋषि को बतायी तब जीतनी थी अब भी उतनी ही है ना घटी है ना ही बढ़ी है और ना ही बढे गी और ना ही किसी विश्व विद्यालय में पढ़ये जाने की विद्या है क्यों की पराशर जैसे ऋषि को पहले ही समझ हो गयी थी की कलयुग में ज्योतिष के नाम पर छल होगा लिहाजा सात तालो में बंद करके गए है जनाब जो काठ के उलूऊ के हाँथ आने वाली नहीं है यह विद्या जो सुशिल दीक्षित होगा ज्योतिष उसके दरवाजे खुद चल कर जाए गी / थैंक्स/

प्रवीण जाखड़ said...

सोचा था कि परीक्षाओं के बीच ब्लॉगिंग बंद रखूंगा। ...बस 16 तारीख तक एमबीए के तीन पेपर और बचे हैं। जरा धीरज धरिए। ...लेकिन आज जब अपना मेल खोला तो आपकी टिप्पणी पाकर अंगुलियां चल पड़ी हैं पंकज जी। समय का अभाव है। ...और एक बार में एक ही काम पर ध्यान देने की कोशिश करता हंू, इसलिए यहां सिर्फ आपने जो लिखा है उसकी तारीफ करना चाहंूगा।
इस पूरी लेखमाला और इस कड़ी में आपने स्वतंत्र विचारों और खुले दिमाग के साथ एक विषय को लेने और उसपर सोचने की बात कही, जो काबिलेतारीफ है। एक निवेदन और करना चाहंूगा, मेरी इस टिप्पणी के ऊपर जो शशिभूषण जी की लंबी-चौड़ी टिप्पणी आप पढ़ रहे हैं, उन्हें जरूर पढि़एगा। ...और अपनी अगली कड़ी को अंतिम कड़ी ना बनाते हुए उसमें एक कड़ी शशिभूषण जी की जरूर जोडि़एगा। यह बात इसलिए कह रहा हंू कि जिन सात यक्ष प्रश्नों से यह मुद्दा शुरू हुआ है, उसमें शशिभूषण जी की अहम भूमिका रही है। ये इस पूरे मामले में इकलौते ऐेसे ज्योतिषी के तौर पर उभरे हैं, जिन्होंने उस सात सवालों के प्रस्ताव को स्वीकार कर उनका जवाब उसी असर वाली प्रतिक्रिया से देने का साहस जुटाया है। शशि जी के लिए यही कहंूगा कि कोई एक हिम्मतवाला आदमी सामने आया जिसने उस चैलेंज को साफ मन से, सच्चे अर्थ में स्वीकार करने की हिम्मत की। उन्होंने साफ कहा है अपनी टिप्पणियों में कि वे शुरुआती दिनों में मेरे प्रस्तुतिकरण से खफा थे, जब उन्होंने देखा कि मैंने एक ज्योतिष को लेकर इतना कुछ लिख दिया है, बवाल बना दिया है। लेकिन जब उनकी खुद इन सवालों के जवाब और इस तार्किक बहस पर चर्चा हुई, जो टिप्पणियों में मेरे ब्लॉग पर और शशि जी के ब्लॉग पर मौजूद है, तो उन्हें कहीं से भी नहीं लगा कि मैंने चला कर संगीता जी को निशाना बनाया है (जैसा कि मुद्दा उठने के बाद कई लोगों द्वारा कहा गया था)। शशि जी सवालों को जवाबों से निकटता तक लाने में कामयाब हुए हैं, लेकिन दुर्भाग्य देखिए हिंदी ब्लॉगिंग का कि लोग उन्हें पढऩे तक नहीं गए। मैं नहीं जानता शशि जी के ब्लॉग पर लोग टिप्पणियां करने क्यंू नहीं आते। इस बारे में सिर्फ यही सोचता हंू कि ब्लॉगिंग जगत में पढ़ कर प्रतिक्रियाएं देने का चलन अब भी नहीं है। मेरी नजर में शशि जी, संगीता पुरी जी से ज्यादा ही ज्योतिष ज्ञान रखते हैं (यह मेरा निजी विचार है)। अच्छा लिखते हैं और सुलझा लिखते हैं। उनके शब्दों की बुनावट उनका अपने विषय पर पकड़ और कॉन्फिडेंस दिखाती है। आप अपनी कडिय़ों में उन्हें पढ़ कर शामिल करेंगे, तो खुशी होगी। वर्ना शायद आपका यह प्रयास अधूरा कहा जाए।

आपके प्रयास सराहयनीय हैं पंकज जी। वर्ना यकीन जानिए मैं परीक्षा के बीच इतना वक्त कभी नहीं निकालता। शुक्रिया। जुटे रहिए।