Monday, October 26, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...१

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

एक तरफ संगीतापुरी जैसे लोग हैं, जो भारतीय विधाओं जैसे ज्योतिष आदि के मूल तत्व को जानना चाहते हैं, समर्पित हो जाना चाहते हैं और तमाम आडंबरों व दकियानुसीता  को दूर फटकारते हुए ज्योतिष जैसी विधा को जन जन तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, तो दूसरी तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग हैं, जो ज्योतिष आदि भारतीय विधाओं पर गर्व करते हैं और यकिन भी करते हैं, लेकिन ज्योतिष के नाम पर चल रही दुकानदारी से उन्हें घीन है, जो ज्योतिष के नाम पर हो रही अंधश्रृद्घा और आडम्बर से नफ़रत करते है और इसीलिए जहां कहीं कुछ कमी हो जाती है, ये अपनी कलम के माध्यम से वार करने को बेताब नजर आते हैं, इन्हें तथ्य चाहिए होते हैं और जब इन्हें नहीं मिलते हैं तो ऐसे लोग खुला चेलेंज देते हैं और करते हंै सवालों की बौछार, जब इनको जवाब नहीं मिलता है, तो मुमकिन है कि ज्योतिष से इनकी आस्था धीरे-धीरे कम भी होती जाती है।


एक तरफ प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जो आडंबरों के धूर विरोधी, तो दूसरी तरफ संगीतापुरी जैसे लोग जिन्हें पुरातन विधाओं के मूल को सहजने और उसकी निरंतरता स्थापित करने में गहरी दिलचस्पी है, मगर इन दोनों व्यक्तित्वों के बीच ऐसे लोग भी हंै, जिन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं है, जो अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए ज्योतिष के नाम पर दुकानदारी चलाते हैं और सामने वाले को मुर्गा मान उसे फंसाने से पीछे नहीं हटते। असल में ये ही लोग होते हैं,  जिनके कारण भारतीय विधाएं और ज्योतिष बदनाम हैं।

दरअसल, जब प्रवीण जाखड़ जैसे लोग आडंबरों पर कुठाराघात करते हैं, तो  इन लोगों पर तो कोई असर नहीं होता है, वरन संगीतापुरी जैसे लोग निशाने पर आ जाते हैं। तब संगीतापुरी जैसे लोग व्यथित होते हैं, विचलित भी हो सकते हैं। ये व्यथित होते हैं, यही इसका प्रमाण है  कि ये आडंबरों के पोषक नहीं, वरन भारतीय विधाओं को स्थापित करने के लिए समर्पित होने वाले लोगों में से हैं, जबकि ज्योतिष के नाम पर मुर्गा मान लोगों को फांसने वालों पर इसका कोई असर नहीं होता है।

प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जब आडंबरों और कुरीतियों से पर लेखनी के माध्यम से कुठाराघात करते हैं,  सवाल उठाते हैं, तो  संगीतापुरी जैसे लोग जो अनुसंधान में लगे हैं, व्यथित  हो जाते हैं, विचलित हो जाते हैं, उनकी तन्मयता भंग हो जाती है और  फिर ये प्रवीण जाखड़ जैसे लोगों को अपना विरोधी मानने लग जाते हैं।  प्रवीण जाखड़ और संगीता पूरी जैसे लोग आपस में लड़ते झगड़ते रह जाते हैं और मजा दूसरे लोग मार जाते हैं और बदनाम ज्योतिष जैसी विधाएं होती रहती है?

अब स्पष्ट हो जाना चाहिए कि एक  तरफ   आडंबरों के धूर विरोधी हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग जो आडंबरों को दूर तो करना चाहते हैं, लेकिन ज्योतिष जैसी भारतीय विधाओं आदि को विश्व पटल से ओझल होते हुए भी नहीं देख सकते हैं और उसके मूल को सबके सामने लाना चाहते हैं। इनके बीच हैं ऐसे लोग जिनके  लिए ये सब दुकानदारी है, इनके कारण ज्योतिष जैसी विधाएं बदनाम हो रही है, और फिर ऐसे लोग भी तो हैं, जिनका मकसद ज्योतिष जैसी विधाओं को बदनाम करना ही है। वे ऐसे मौकों को और लोगों को ढूंढते रहते हैं, कि कहां कमी नजर आए और बदनाम करें...

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ ·र गुजरना है ...ये हेडिंग जब आपके सामने से गुजरती होगी आपके जेहन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि इन सबके बीच मुझे क्या कर गुजरना है? 
तो  मैं उन हालातों को आपके सामने लाना चाहता हंू, जिनके कारण संगीतापुरी जैसे लोग निशाने पर आते हैं। मैं उन हालातों को बताना चाहता हूं, जिनके कारण प्रवीण जाखड़ जैसे लोग जब खुले तौर पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें उनका जवाब नहीं मिलता है?  क्यों जवाब नहीं मिलता हैï, यही बताने का जतन मैं करना चाहता हूँ...मैं उन सवालों को उठाना चाहता हूं, मैं उन कारणों को बताना चाहता हूं, जिनके कारण प्रवीण जाखड़ जैसे लोगों को उनके सवालों के जवाब नहीं मिलते और निशाने पर आ जाते हैं संगीतापुरी जैसे लोग।

यहां मैं सवाल छोड़ जाता हूं आपके लिए कि आखिर ऐसे क्या कारण रहे हैं, जो ज्योतिष जैसी विधा के जानकारों की कमी होती गई और आडंबरों की भरमार? क्यों होती गई ज्योतिष जैसी विधाओं की उपेक्षा और भारतीय विधाए बदनाम

हम मिलकर  करेंगे इसकी चर्चा ...आपकी चाहियें सहभागिता .....
पंकज व्यास रतलाम

7 comments:

Mohammed Umar Kairanvi said...

जाखड जी तो बहाना है, वर्ना हमतो आपको पढने आये हैं,

Nirmla Kapila said...

सब से बडा कारण है कि लोग पैसे को अधिक महत्व देने लगे हैं और धन कमाने के लोये कुछ भी कर सकते हैं। ज्योतिश की पूरी जानकारी के बिना लोगों को अपने जाल मे फसाते हैं और ऐसी अनमोल भारतिये विधाओं को बदनाम करते हैं
दूसरा सब से बडा कारण है कि हमारे रिशी मुनियों के बाद इस विधा पर कोई अनुसंधान नहीं हुया देश काल प्रिस्थितिओं के हिसब से इस पर रिसर्च नहीं हुई।विदेशी चाहे इस से लाभ उठा गये होँ मगर हम लोग इसे सिर्फ धन कमाने का साधन समझ बैठे।बेशक हमे अपनी इस धरोहर को जीवित रखने के लिये इस पर शिध की जरूरत है ये विश्य अपने आप मे एक विग्यान है। दुख होता है कि हम अपनी विरासत को सहेज नहीं पाये
तीसरा कारण है कि पुरातन पुस्तकें संस्कृ्त मे थी जिन्हें अपने स्वार्थ और बुद्धी के हिसाब से अन्यभाशाओं मे तोड मरोड कर लिखा जाता रहा है और नये नये लोग बिना शिध किये सस्ती और चालू पुस्तकें लिख कर इस विद्द्या का विनाश करते रहे हैं।हमारे रिशी मुनियों ने िऐसा बहुत कुछ तब लिखा जब विग्यान ने नहीं जाना थ aaतो फिर ये विद्या । भी हमारे रिशी मुनियों की धरोहर है जिसे हमने गवा दिया। जब सम्पूर्ण ग्यान ही नहीं शोध ही नहीं तो हम उसे गलत या सही कैसे ठहरा सकते हैं ये प्रपंच जो आज कल दिख रहे हैं ये हमारे स्वार्थ का फल हैं धन्यवाद्

अर्शिया said...

आपका उत्साह काबिले तारीफ है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत-बहुत बधाई।
आप लिखते रहो हम पढ़ते रहेंगे।

संगीता पुरी said...

अच्‍छा विश्‍लेषण .. अगली कडी का इंतजार रहेगा !!

radhasaxena said...

jyotiSh ke bare kuch kare.Hame prateexaa rahegi.

प्रवीण जाखड़ said...

सबसे पहले माफी चाहंूगा देरी से कमेंट देने के लिए पंकज जी। क्योंकि मैं बिना पढ़े कमेंट देता नहीं और मेरी एमबीए की परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए मैं ब्लॉगिंग को इन दिनों ज्यादा वक्त नहीं दे पा रहा हंू।

निवेदन करना चाहंूगा कि आपने पिछली तीनों कडिय़ों में अब तक जो भी संगीता जी और मेरे बारे में लिखा उसमें स्वच्छ बहस में जो कुछ होना चाहिए था वह सब पाठकों को मिला। यह बात सही है कि विधाएं बदनाम भी हो रही हैं। उनसे जुड़े ज्ञान का खोखलापन और अधरझूलता शायद मुझ जैसे लोगों को विवश कर देती हैं और सवाल उठ खड़े होते हैं। इस पूरे मामले में भी ऐसा ही हुआ। मैं नहीं जानता कि संगीता जी को ज्योतिष का कितना ज्ञान है, कितना उनका अनुभव है। मैंने तो बस उनके दावों के प्रत्युत्तर अपने सवाल दे दिए थे। अगर कोई और ज्योतिष दावा करता मिल जाता मैं शायद उनसे भी पूछ बैठता। सही मायने में ज्योतिष विज्ञान है, उसे खारिज हम नहीं कर सकते। ...और हम होते भी कौन हैं जो एक अहम विषय को खारिज करने का दुस्साहस करें, लेकिन अगर उसका कोई ज्ञान जुटा रहा है और दावे कर रहा है, तो इतना हक हमारा भी बनता है कि वैसे ही कुछ और दावों पर अपनी सटीक टिप्पणी देकर उन्हें सच साबित करके दिखाए।

अच्छी परीक्षाएं चली हैं ज्योतिष और ज्ञान की। लेकिन इस पूरे मामले में काफी दिमाग की पड़ते खुली हैं। मैं काफी बड़े-बड़े ज्योतिषियों से मिला हंू। ऐसे ज्योतिषियों को भी जानता हंू जो प्रधानमंत्री बनने के एक महीने-दो महीने बाद किसी छोटे-मोटे पत्र-पत्रिका में बैक डेट में यह प्रकाशित करवा लेते हैं कि उन्होंने अमुक व्यक्ति के प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने की घोषणा चुनावों के पहले ही कर दी थी। और दिलचस्प बात यह है कि फिर उसी कटिंग और ऐसे ही फर्जी कलेक्शन की बदौलत बड़े नेताओं, फिल्मी हस्तियों, मंत्रियों इत्यादि से अपने चरण पकड़वाते फिरते हैं। जबकि इनकी पब्लिक इमेज जबरदस्त होती है।

अब आप ही बताएं जब साक्षात ऐसे लोगों को देख लिया तो अब बचा ही क्या है। बस मैं इस विषय में भरोसा करते हुए अपनी जिज्ञासाएं शांत करना चाहता हंू। परखना चाहता हंू कि कोई है ऐसा ज्योतिष जो वाकई सच्चाई के करीब हो।
आपका बहुत बहुत आभार आपने एक स्वच्छ बहस को आगे बढ़ाया।