Thursday, September 10, 2009

व्यंग्य: क्या करें, ये मास्टर मानते ही नहीं...

पंकज व्यास, रतलाम
क्या करें साब! ये लोग तो ऐसे नाक-भौं सिंकोड़ रहे हैं, जैसे बहुत बड़़ी बात हो गई हो। शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों पर लाठी चार्ज क्या कर दिया, मानो पहाड़ टूट गया, आसमान फट गया, जिसको देखों वो सरकार की आलोचना करने में लगा है। कोई ताने कस रहा है, तो कोई व्यंग्य कर रहा है।


सरकार! अब क्या करें। ये लोग समझते ही नहीं। ये मास्टर लोग छोटी-छोटी बातों पर हड़ताल, धरना प्रदर्शन करने लग जाते हैं। अब भला सरकार रूई की तरह धुनाई नहीं करे तो क्या करें?
क्या करें, सरकार! आपने तो इन्हें राष्टï्रऋषि जैसा सम्मान दे दिया तो भी सब्र नहीं। ये मास्टर समान कार्य समान वेतन की मांग करते हैं। इन मास्टरों का स्वाभिमान न जाने कहां चला गया। एक तुच्छ सी चीज के लिए आंदोलन करने पर उतारू हो जाते हैं।
क्या करें, सरकार! इन मास्टरों का स्वाभिमान न जाने कहां चला गया? माया मोह में उलझते हैं, रूपयों पैसों के पीछे भागते हैं। इतनी सी बात समझ नहीं आती कि ऋषि बनने के बाद माया-मोह नहीं व्यापना चाहिए। दुनियादारी की जरूरततों को कम करने चाहिए।
क्या करें सरकार! आपने इन्हें ऋषि बनाया, लेकिन ये ऋषि जैसा स्वाभिमान नहीं ला पाए। इन मास्टरों को ये बात समझ नहीं आती कि स्वाभिमान से जीओ, चाहे घर में तंगहाली हो।चाहें बच्चे भूखे मर जाए। इन मास्टरों को अपने बच्चों के कॅरियर की चिंता होने लगी है, उनके खाने-पीने की चिंता करने लगे हैं, अपने भविष्य की चिंता करने लगे हैं, अपने घर-बार परिवार की चिंता करने लगे है।
क्या करें, सरकार! अब इन्हें कौन समझाएं कि ये सब बाद की बात है। पहले स्वाभिमान से जिएं। सरकार! आपने तो इनके लिए बहुत कुछ किया। आपने इन मास्टरों को स्वाभिमान करने के लिए राष्टï्रऋषि नाम तक दे दिया। पर गलती इन्हीं की है, जो इन्हीं राष्टï्रऋषि का भान नहीं, उस पर मान करते नहीं आता। छोटी-छोटी बातों के लिए आंदोलन को उतारू हो जाते हैं।
क्या करें, सरकार! इन्हें राष्ट्रऋषि बना दिया, फिर भी इनकों तुच्छ सी भूख लगती है। राष्ट्रऋषि बनाने के बाद भी ये त्यागी नहीं हो पाए। इस दुनिया से विरक्त नहीं हो पाए, जैसे ऋषि होते हैं। इन्होंने अपनी जरूरते कम नहीं की, जैसे ऋषि करते हैं।
क्या करें, सरकार! आपने तो बहुत अच्छा काम किया था, लेकिन ये मास्टर सांसारिक के सांसारिक रह गए। कमबख्त महंगाई से ये भी पीडि़त होते हैं। इनकों भी आटा-दाल शक्कर खानी पड़ती है। इनके भी बीबी बच्चे हैं। इन मास्टरों को तो आपके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करन चाहिए कि सरकार! आपने राष्टï्रऋषि बनाया, लेकिन ये तो छोटी छोटी बात को लेकर आंदोलन करते रहते हैं।
क्या करें, सरकार! ये मास्टर दिए तले अंधेरा नहीं रहने देना चाहते हैं। ये मास्टर समझते ही नहीं। अपने घर-बार परिवार की चिंता करने लगे हैं। इन्हें तो बस समाज की चिंता करनी चाहिए, चाहे परिवार जाए भाड़ में। इन्हें ऋषि जैसा व्यवहार करना चाहिए।
सरकार! ये नहीं समझते तो आप ही ये छोटी सी बात समझ जाओ कि आखिरार ये आपके ही सेवक हैं। आप ही इनके माई बाप हो। अन्नदाता हो। ये आपसे मांग नहीं करेंगे, तो किससे करेंगे?
पर, आप भी क्या कर सकते हैं, सरकार! आपके पास इनकी समस्यां सुनने का टाईम नहीं है। आखिरकार समझना तो इन मास्टरों को ही है। अगर नहीं, समझे तो ऊंगली टेड़ी करके समझाना पड़ेगा। प्यार से काम न चले तो मार से चलाना पड़ेगा, और वहीं आपने किया। आपने जो किया सही किया, क्योंकि आपके पास सत्ता है, शासन है, पुलिस है, प्रशासन है। आप सरकार है, आप इनकी नहीं सुनते पुकार, क्योंकि इन मास्टरों को आपकी दरकार है।
पंकज व्यास, रतलाम

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी चिन्ता जायज है।
बधाई!

गिरिजेश राव said...

किसी की दुर्दशा करनी हो तो उसे holy cow का दर्जा दे देना सरल उपाय है। शिक्षा के पेशे के साथ भी यही हुआ है। लाठी भाँज हाय तौबा करना भी उसी षड़यंत्र का एक भाग है।

शिक्षकों को दुहरी लड़ाई लड़नी होगी- प्रशासन और शिक्षक समाज के भीतर के पाखण्डियों से । सवाल यह है कि नेतृत्त्व उभर क्यों नहीं रहा? क्या इस समाज में प्रतिभा और नेतृत्त्व क्षमता की कमी हो गई है? यदि ऐसा है तो शोचनीय है क्यों कि मेरे ही होश में प्राइमरी का मास्टर भी पूज्य और गाँव का प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी होता था। अब ऐसा क्या हो गया कि ...?