Tuesday, September 29, 2009

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

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प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है...1


  • बात संगीता पुरी जी की .
संगीता पुरी जी उन लोगों ी प्रतीक है, जो ऐसा मानते हैं कि वक्त के साथ भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म में कई बुराई आई हंै, लेकिन उन बुराईयों के बावजुद हिन्दू धर्म में अथाह ज्ञान का सागर है, उनका लक्ष्य है अच्छाई को देखना। ये उन लोगों में शुमार है, जो भारतीय विधाओं में बुराईयों को दरकिनार कर भारतीय विधाओं का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो चाहते हैं कि हिन्दू धर्म में छुपे हीरे-मोती को जनमानस के सामने लाया जाए।
संगीता पुरी जी उन लोगों में शामिल की जा सकती हंै, जो भारत की प्राचीन विधाओं पर गर्व करते हंै और भरपुर विश्वास भी करते हैं। फ़िर भी नवीनता लिए हुयें है....



बकौल संंगीतापुरी- परंपरागत ज्योतिष का जो जड़ है , वो है हमारे पूजनीय ऋषि , महर्षियों की निरंतर ी गयी मेहनत, जिसके फलस्वरूप प्राचीन काल से ही खगोल शास्त्र का इतना विकास हो सका था। उसी जड़ के आधार पर फलित ज्योतिष का पौध विकसित किया गया, जो पूर्ण तौर पर पल्लवित और पुष्पित होकर बड़ा वृक्ष बन अपनी सुगंधि बिखेरने लगा।

सगीतापुरी उन लोगों में शुमार है, जो न केवल भारतीय विधाओं पर विश्वास व गर्व करते हैं, वरन् उन्हें फ़िर से सुप्रतिष्ठिïत करने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं और ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नीत नए अनुसंधान कर देना चाहते हैं।

संगीतापुरी जी उन लोगों में सम्मिलित की जा सकतीं है, जो भारतीय वांगमय पर गर्व तो करते हैं, लेकिन किसी भी रूढ़ीवादिता को नहीं मानते, जो किसी ढोंग को, अंधविश्वास को तवज्जो नहीं देते, बल्कि केवल धर्म में, अध्यात्म में मुद्दे की बात ढूंढते हैं, अध्यात्म की बात, ज्ञान की बात ढूंढते हैं, ये ज्ञापन पिपासु

संगीतापुरीजी खुद अपने बारे में बतातीं है- अपने बारे में कुछ खास नहीं बताने को अभी तक ॥ ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकालने में सफ़लता पाते रहना ॥ बस सकारात्मक सोंच रखती हूं ॥ सकारात्मक काम करती हूं .. हर जगह सकारात्मक सोच देखना चाहती हूं ॥
आकाश को छूने के सपने हैं मेरे ॥ और उसे हकीकत में बदलने को प्रयासरत हूं ॥ सफलता का इंतजार है।

संगीतापुरीजी उन लोगों का प्रतिनिधित्व करतीं है, जो न केवल भारतीय धर्म, संस्कृति, वेद-वेदांग, उपांग, वांगमय पर न केवल गर्व करते हैं, वरन उसके अनुशंधान के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हुए समर्पित हो जाना चाहते हैं। संगीतापुरी जी अपने आपको समर्पित कर देना चाहतीं है ज्योतिष को। संगीतापुरीजी अपने शोक क·े बारे में बताते हुए लिखतीं है- हल्की फुल्की पुस्तकें या पत्र पत्रिकाएं .. जितनी भी मिल जाएं .. सब पढ लूंगी .. पर गंभीर अध्ययन सिर्फ ज्योतिष का।

जिस किसी ने भारतीय संस्कृति की पुरातन कलाओं का, विधाओं का थोड़ा भी अध्ययन किया होगा, वो जानता होगा कि भारत का पुरातन साहित्य कितना वृहद और विस्तृत रूप लिया है। उन वृहद और विस्तृत विधाओं में से संगीतापुरी जी ने एक को चुना और वह है ज्योतिष। और ज्योतिष का क्षेत्र भी बड़ा विस्तार लिए हुए हैं, उस वृहद ज्योतिष में से भी संगीतापुरीजी ने चुना ज्योतिष को।

माफ करना संगीतापुरीजी, एक निवेदन कर देना चाहता हूं इस निवेदन को भारतीय विधाओं पर प्रश्न उठाने वाले भी जरूर पढ़ लें। निवेदन है कि संगीतापुरीजी अगर/यदि आपने कोई भविष्यवाणी की और सही नहीं निकली तो उसमें ज्योतिष का दोष नहीं, आपकी चूक होती है। कहीं न कहीं भूल आप से होती है, आपके अध्ययन में कमी होती है, जो आपकी भविष्यवाणी को गलत सिद्घ करती है।

एक सरल सा उदाहरण देता हूं, जैसे कम्प्यूटर में किसी बेडसेक्टर की, वायरस वाली फाईल डाउनलोड कर ली या कोई गलत कमांड दे दी, तो कंप्यूटर खराब हो जाए, तो इसमें कम्प्यूटर की गलती है या बेड सेक्टर, या वायरस फाईल डाउनलोड करने वाले की? जवाब सीधा सा है डाउनलोड करने वाले की गलती होगी, कंप्यूटर की नही...

समस्त ज्योतिषियों और दूसरी विधाओं के जानकारों से निवेदन निवेदन कर देना चाहता हूं, कि अगर आपकी खूद की गलती की वजह से अगर कोई भविष्यवाणी गलत सिद्घ होती है, किसी विधा में आप असफल होते हैं, तो आप इसे अहं का कारण न बनाएं और अपनी गलती स्वीकार करें, केवल आपके अहम के कारण के कारण आपकी विधा पर प्रश्न चिह्नï लगता है।

लेख माला की अगली कड़ी में हम पड़ताल करेंगे इस बात की कि भारत का अतीत गौरव शाली रहा है, हमने ज्ञान के क्षेत्र में डंका बजाया था, पिर भी वर्तमान में ज्योतिष विज्ञान के वैज्ञानिक होते हुए भी, प्राय: क्यों सटिक भविष्यवाणियां नहीं हो पाती हैंऔर कमोबेश यही हालत भारत की पुरातन सभी विधाओं की है...
जरूर पड़ें लेखमाला की अगली कड़ी
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...3

7 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है, मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...

पोस्ट अपने में स्वयं बहुत कुछ कहती है,
मगर हम चुप ही रहेंगे.....

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने |

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

sahi kaha hai aapne

Udan Tashtari said...

जारी रहिये, पढ़ रहे हैं.

प्रवीण जाखड़ said...

दिलचस्प तरीका है आपके पोस्टमार्टम का। दोनों कडिय़ां दिलचस्प, अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार है। आप लगे रहिए। खुशी हुई कोई बिंदास लिखने कि हिम्मत रखता है।

संगीता पुरी said...

ज्‍योतिष जैसे उपेक्षित विषय पर आपने अपना इतना बहुमूल्‍य समय जाया किया .. और 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के भाव को पूरी तरह समझने की कोशिश की है .. बहुत बहुत धन्‍यवाद आपका .. काश आपकी ही तरह सारे पाठक यह समझ पाते कि .. मैं समाज में अंधविश्‍वास के प्रचार प्रसार के लिए नहीं .. समाज से धार्मिक और ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने के लिए लिखा करती हूं .. भारत की पुरातन सभी विधियों के बारे में चर्चा करती हुई आपकी अगली कडियों का भी इंतजार रहेगा !!

mypoeticresponse said...

Pankaj
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