Monday, April 13, 2009

गर चाहते हों, जूता जनता का हथियार न बनें, तो जनता को तवज्जो दो

पंकज व्यास, रतलाम
गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर पत्रकार ने जूता फेंका, घटना जन-मन के मानस पटल से धूमिल ही नहीं हुई कि एक शिक्षक ने कांग्रेस नेता नवीन जिंदल पर जूता फेंका।
गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर पत्रकार ने जूता फेंका, घटना जन-मन के मानस पटल से धूमिल ही नहीं हुई कि एक शिक्षक ने कांग्रेस नेता नवीन जिंदल पर जूता फेंका। आदर्शों की बात करें तो विरोध का यह तरीका उचित नहीं कहा जा सकता है, निदंनीय है। लेकिन, जनरैलसिंह ने जो जूता फैंका उसकी जो प्रतिक्रियाएं हुई, उनमें स्पष्टïत: इसे समर्थन देने वालों की तादाद ज्यादा रही और विरोध करने वालो की संख्या कम। इसका एक नमूना देखना है, तो आप ब्लॉगर्स की दुनिया में चले जाइए। ये इस बात का संकेत हैं कि लोगों में व्यवस्था के खिलाफ कितना आक्रोश है।पत्रकार ने जूता फैंका तो कहा जा सकता है कि पत्रकार को ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन शिक्षक ने फेंका तो क्या कहा जाएगा? और लोगों ने जो इस जूते का महिमा मंडन किया, इस घटना का समर्थन किया उन लोगों के बारे में क्या कहोंगे? और यही जूता अगर जनता के हाथ में आ गया तो क्या कहोंगे? ऐसा न हो इसके लिए कदम उठाया जाना चाहिए। स्पष्टï है कमी कहीं न कहीं नेताओं के चरित्र में आई है। नेताओं की जनता के प्रति प्रतिबद्घता कम हुई है। विरोध करने के सर्वमान्य तरिकों को तवज्जो नहीं दी जा रही है। आए दिन कितने ही ज्ञापन जनता नेता के नाम देती हैं, कितने ही लोग समाचार-पत्रों के माध्यम से अपनी आवाज उठाते हैं, लोग धरने देते हैं, रैली निकालते हैं, लेकिन जनता की मांग पर पर कार्रवाई करने की बात तो दूर उन्हें तवज्ज्जो देने की फुरसत किसे हैं? राजनेता राजनीति में मस्त है। विकास के लिए राजनीति नहीं, राजनीति के लिए विकास हो रहा है। राजनीति सेवा करने का नहीं, मेवा खाने भर का माध्यम बनकर रह गई है। इसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। आपके अपने क्षेत्र के सांसद ने पांच साल में जनता के लिए क्या किया, इसका ही हिसाब लगा लिया जाए। कोई सांसद पांच साल में किए गए पांच काम भी बता दें, तो बहुत बड़ी बात होगी। उनमें भी धरातल पर कितने हुए, उनकी तो बात ही मत कीजिए। कहीं कार्य स्वीकृत भर हुए, तो कही सर्वे हुए हैं, जनता आउटपुट चाहती हैंं जनाब, आउटपुट, कागजों में, आंकड़ों में किए गए विकास कार्यों से जनता को कोई मतलब नहीं होता है, उन्हें तो बताओ कि ये देखों हमने ये काम किया है...। अगर सांसद सरकार में रही पार्टी से नहीं है, तो उसके पास तो सीधा-सा बहाना होता है कि सरकार हमारी नहीं थी। लेकिन, सवाल ये हैं कि सांसद निधि तो थी, उसका क्या किया?जूते फेंकने जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए जरूरी है कि नेता जनता का ख्याल करना त्वरित प्रभाव से शुरू करें, विरोध के सर्वमान्य तरीकों को तवज्जों दी जाए, ज्ञापन देने के बाद, धरनों के बाद, रैलियों के बाद समाचार पत्रों में आवाज उठाने के बाद सरकार जनता के लिए क्या कर रही है, क्या नहीं कर रही है, यह स्पष्टï किया जाए, नेता जनता को बेवकूफ समझना बंद करें। तो ही लोकतंत्र सही मायने में सफल हो सकता है। वरना, तो जनता की आवाज को, आक्रोश को, विचारों को दबाया जा सकता है, लेकिन उन्हें नष्टï नहीं किया जा सकता।

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

एक शिक्षक द्नारा किये गये,
इस जूता प्रहार की निन्दा करता हूँ।

bharats said...

Pankaj bhai lagta hai hmare-apke joote hi ab kranti la skte hain.
Kafi dino tk blog kholna sambhaw nhin hua. Deri ke liye khed hai.
My postal adress- 6/686, Lodhi Colony, New Delhi-110003

pankaj vyas said...

bharats ji
post se prati bhejane ke liye date ki sima rahati hai. usi din jisdin ka akhabar hai,post kiya ja sakata hai.
khed hai ki aap late hoohen, our date nikal gai aab prati bhejane me ham asamartha hai.

aapko postale jo mene mail add diya thha us par send karana tha.
asuvidhake liyen khed.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

विरोध का यह तरीका उचित नहीं.......